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नज़्म
होची-मिन के देस में हम ने क्या क्या सितम न ढाए
उस के जियाले तो आज़ादी का सूरज ले आए
अहमद फ़राज़
नज़्म
तो मैं ने क्या किया
कि अपनी साँस रोक कर के, आँखें मीच कर के सर को आगे कर के
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
जैसे चाँद की ताक में हर दम चकोर रहता है
जैसे चाँद की घात में कोई मेघ का काला चोर रहता है