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नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखो
गरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वो जब हंगाम-ए-रुख़्सत देखती थी मुझ को मुड़ मुड़ कर
तो ख़ुद फ़ितरत के दिल में महशर-ए-जज़्बात होता था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
वो राह बदलते हैं अपनी और मुड़ कर हाथ हिलाते हैं
लेकिन वो दिलों को यादों की ख़ुशबू बन कर महकाते हैं
फ़हमीदा रियाज़
नज़्म
मुँह धो कर जब उस ने मुड़ कर मेरी जानिब देखा
मुझ को ये महसूस हुआ जैसे कोई बिजली चमकी है
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
मुद्दआ तेरा अगर दुनिया में है ता'लीम-ए-दीं
तर्क-ए-दुनिया क़ौम को अपनी न सिखलाना कहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़मीं पर किसी दिन की पहली घड़ी है
ज़मीं घूम कर अपने बाबा की जानिब मुड़ी है