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नज़्म
ईद आई और क्या क्या याद ताज़ा कर गई
सोंंच बिछड़ों की है दिल में और ख़याल-ए-ईद है
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
क्या थाल कटोरी चाँदी की क्या पीतल की ढिबिया-ढकनी
क्या बर्तन सोने चाँदी के क्या मिट्टी की हंडिया चीनी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैं
रूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हिक्मत-ए-मग़रिब से मिल्लत की ये कैफ़िय्यत हुई
टुकड़े टुकड़े जिस तरह सोने को कर देता है गाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सोचता हूँ कि तुझे मिल के मैं जिस सोच में हूँ
पहले उस सोच का मक़्सूम समझ लूँ तो कहूँ