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नज़्म
हर आन दिलों विच याँ अपने जो ध्यान गुरु का धरते हैं
और सेवक हो कर उन के ही हर सूरत बीच कहाते हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वीर-सिंह और अमृता-प्रीतम यहाँ माहिर यहाँ
'अर्श' 'अख़्तर' 'जोश' और 'महरूम' से शाइ'र यहाँ
अर्श मलसियानी
नज़्म
ये वीर-ओ-गौतम की ज़मीं अमन-ओ-अहिंसा का चमन
अकबर के ख़्वाबों का जहाँ चिश्ती-ओ-नानक का वतन
रिफ़अत सरोश
नज़्म
मैं पहुँच जाऊँ अगर आप मुझे याद करें
मेरी रफ़्तार-ए-तख़य्युल की भी रफ़्तार से तेज़