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नज़्म
'ग़ालिब' जिसे कहते हैं उर्दू ही का शाइर था
उर्दू पे सितम ढा कर 'ग़ालिब' पे करम क्यूँ है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
शोरिश काश्मीरी
नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
वो मिरे दिल की उजड़ी दुआ जिस को दिल ढा गया
रात दिन सर्द लम्हों के तेज़ाब में गलने वाली मिरी जाँ
सरवत ज़ेहरा
नज़्म
जवानो आओ अपनी ग़ैरतों को मिल के ललकारें
उन्हें ढा दें खड़ी हैं आज जो नफ़रत की दीवारें