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नज़्म
किस ने वस्ल का सूरज देखा किस पर हिज्र की रात ढली
गेसुओं वाले कौन थे क्या थे उन को क्या जतलाओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
क़ानून बनाए जाते हैं, ज़ंजीरें ढाली जाती हैं
फिर भी आग़ाज़ की शोख़ी में अंजाम दिखाई देता है
जमील मज़हरी
नज़्म
सैल के साँचे में ढाली हुई रिफ़अत की क़सम
तेरे जल्वों की क़सम, तेरी लताफ़त की क़सम
परवेज़ शाहिदी
नज़्म
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
नज़ारे शहर-ओ-साहिल के परेशाँ हो गए होंगे
ढली होगी जो शाम-ए-ग़म सितारे सो गए होंगे
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
ये चुप कितने दिन की थी जो आंसुओं में ढली
ये गहरी चट्टान ऐसी पथरीली जामिद अनोखी सी चुप