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नज़्म
रिश्वत-ख़ोरी और ग़बन की दफ़्तर दफ़्तर धूम रहेगी
कमज़ोरों पर शह-ज़ोरों का ज़ुल्म रहेगा
अश्हर नदीमी
नज़्म
जिस दिन से बँधा है ध्यान तिरा घबराए हुए से रहते हैं
हर वक़्त तसव्वुर कर कर के शरमाए हुए से रहते हैं
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहें
जिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़