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नज़्म
लफ़्ज़ पैमान भी इक़रार भी इज़हार भी हैं
ताक़त-ए-सब्र अगर हो तो ये ग़म-ख़्वार भी हैं
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
छुट गए क़ैद में मुझ से मिरे बीवी बच्चे
कोई साथी है न ग़म-ख़्वार मिरा पिंजरे में
वजाहत हुसैन वजाहत
नज़्म
और फिर ख़ुद ही चली आई मुलाक़ात मिरी
आश्ना मौत जो दुश्मन भी है ग़म-ख़्वार भी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
देश-ओ-जाती का हमें ग़म-ख़्वार होना चाहिए
मादर-ए-भारत से हम को प्यार होना चाहिए