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नज़्म
अब धुँदली पड़ती जाती है तारीकी-ए-शब मैं जाता हूँ
वो सुब्ह का तारा उभरा वो पौ फूटी अब मैं जाता हूँ
मजीद अमजद
नज़्म
वो देखो पौ फटी अँधियारे जादों के शिगाफ़ों से
हम उस को मरहमत का नाम देते हैं हर इक शिकवा