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नज़्म
बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ
उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मौत और ज़ीस्त के संगम पे परेशाँ क्यूँ हो
उस का बख़्शा हुआ सह-रंग-ए-अलम ले के चलो
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वर्ना 'ग़ालिब' की ज़बाँ में मिरे हमदम मिरे दोस्त
दाम हर मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुल्कों मुल्कों हम घूमे थे बंजारों की मिस्ल
लेकिन इस की सज-धज सच-मुच दिल-दारों की मिस्ल
अहमद फ़राज़
नज़्म
वो इक बालक जिस को घर से इक दिरहम भी नहीं मिला
मेले की सज-धज में खो कर बाप की उँगली छोड़ गया
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
सब अब्रन तन पर झमक रहा और केसर का माथे टीका
हँस देना हर-दम नाज़-भरा दिखलाना सज-धज शोख़ी का
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो साँवले-पन पर मैदाँ के हल्की सी सबाहत दौड़ चली
थोड़ा सा उभर कर बादल से वो चाँद जबीं झलकाने लगा
जोश मलीहाबादी
नज़्म
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
हम से बाज़ार की रौनक़ है, हम से चेहरों की लाली है
जलता है हमारे दिल का दिया दुनिया की सभा उजयाली है