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नज़्म
अगर ऐ शम'-ए-दिल जलना ही था तुझ को तो जलना था
किसी बेकस की तुर्बत पर चराग़-ए-नीम-जाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
सवाद-ए-आग़ाज़-ए-ख़ुश्क-साली में क्यूँ वरक़ भीगने लगा है
धुआँ धुआँ शाम के अलाव में कोई जंगल जले
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
ऐ कि तेरी ख़िदमतें सरमाया-दार-ए-इल्म हैं
तेरा मक़्सद ज़ीस्त का आग़ाज़-ए-ख़ुश-अंजाम है
मयकश अकबराबादी
नज़्म
सफ़ीर-ए-लैला यही खंडर हैं जहाँ से आग़ाज़-ए-दास्ताँ है
ज़रा सा बैठो तो मैं सुनाऊँ
अली अकबर नातिक़
नज़्म
क्या अजब आग़ाज़-ए-हस्ती, क्या अजब आग़ाज़-ए-कार
जैसे वो ईसार-पेशा मर्द दाना-ओ-ग़मीं
मोहम्मद इज़हारुल हक़
नज़्म
टूट कर बिखरे जो आग़ाज़-ए-जहाँ में रेज़े
साअ'त-ए-हश्र के आने पे ही यकजा होंगे