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नज़्म
शब ढले आफ़्ताबी ज़िया टूट आती है
और आँधियाँ जितनी मर्ज़ी चलें आख़िर-ए-कार रुकती हैं
शुमामा उफ़ुक़
नज़्म
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ये क्या मुमकिन नहीं तू आ के ख़ुद अब इस का दरमाँ कर
फ़ज़ा-ए-दहर में कुछ बरहमी महसूस होती है