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नज़्म
तुम्हें जो पा के ख़ुशी है तुम उस ख़ुशी पे न जाओ
तुम्हें ये इल्म नहीं किस क़दर उदास हूँ मैं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
और वो सब आदर्श, वो सब जो वजह-ए-मलामत ठहरा था
इस मटियाले शख़्स के गहरे मेदे में खुप जाता है
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
भय्या के आदर्शों को कभी भुला न पाया मैं
पर अब जो मैं देख रहा हूँ समाज में बस्ते लोगों को