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नज़्म
कोई साहिल नहीं मंज़िल न कोई मो'जिज़ा हूँ
अहल-ए-बाज़ार का चाहा हुआ सामाँ भी कहाँ
विनोद कुमार त्रिपाठी बशर
नज़्म
आह-ए-दिल-ए-मुज़्तर की तासीर नज़र आई
क्या ख़्वाब-ए-मोहब्बत की ता'बीर नज़र आई
सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
नज़्म
कूचा-ए-'दाग़' से हो कर जो चला हुस्न-ए-ख़याल
शा'इर-ए-अहल-ए-नज़र अहल-ए-ज़बाँ याद आया