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नज़्म
किसी की आह-ए-सोज़ाँ का धुआँ गर्दूं पे रक़्साँ है
किसी का ख़ून-ए-दिल रंग-ए-शफ़क़ में जल्वा-अफ़्शाँ है
तख़्त सिंह
नज़्म
बे-नियाज़-ए-आतिश-ए-सोज़ाँ था वो मर्द-ए-अजीब
उस की आँखों में न था कोई निशान-ए-इज़्तिराब
शबाब ललित
नज़्म
धुआँ उठ्ठे न क्यों शा'इर के क़ल्ब-ए-ज़ार-ओ-सोज़ाँ से
कि खेली जा रही हैं होलियाँ ख़ून-ए-ग़रीबाँ से
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
जो निगाह-ए-अहल-ए-सर्वत में हक़ीर-ओ-पाएमाल
ज़िंदगानी वक़्फ़ थी जिस की बराए अहल-ए-ज़र
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
आह-ए-दिल-ए-मुज़्तर की तासीर नज़र आई
क्या ख़्वाब-ए-मोहब्बत की ता'बीर नज़र आई
सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
नज़्म
मुश्तइ'ल हो जाए जब सीने में आज़ादी की आग
हर-नफ़स को आह-ए-आतिश-बार होना चाहिए