aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aahaTo.n"
आज दिल में वीरानीअब्र बन के घिर आईआज दिल को क्या कहिएबा-वफ़ा न हरजाईफिर भी लोग दीवानेआ गए हैं समझानेअपनी वहशत-ए-दिल केबुन लिए हैं अफ़्सानेख़ुश-ख़याल दुनिया नेगर्मियाँ तो जाती हैंवो रुतें भी आतीं हैंजब मलूल रातों मेंदोस्तों की बातों मेंजी न चैन पाएगाऔर ऊब जाएगाआहटों से गूँजेगीशहर-ए-दिल की पहनाईऔर चाँद रातों मेंचाँदनी के शैदाईहर बहाने निकलेंगेआज़माने निकलेंगेआरज़ू की गहराईढूँडने को रुस्वाईसर्द सर्द रातों कोज़र्द चाँद बख़्शेगाबे-हिसाब तन्हाईबे-हिजाब तन्हाईशहर-ए-दिल की गलियों में
शहर-ए-दिल की गलियों मेंशाम से भटकते हैंचाँद के तमन्नाईबे-क़रार सौदाईदिल-गुदाज़ तारीकीजाँ-गुदाज़ तन्हाईरूह-ओ-जाँ को डसती हैरूह-ओ-जाँ में बस्ती हैशहर-ए-दिल की गलियों मेंताक शब की बेलों परशबनमीं सरिश्कों कीबे-क़रार लोगों नेबे-शुमार लोगों नेयादगार छोड़ी हैइतनी बात थोड़ी हैसद-हज़ार बातें थींहीला-ए-शकेबाईसूरतों की ज़ेबाईकामतों की रा'नाईउन सियाह रातों मेंएक भी न याद आईजा-ब-जा भटकते हैंकिस की राह तकते हैंचाँद के तमन्नाईये नगर कभी पहलेइस क़दर न वीराँ थाकहने वाले कहते हैंक़र्या-ए-निगाराँ थाख़ैर अपने जीने काये भी एक सामाँ थाआज दिल में वीरानीअब्र बन के घिर आईआज दिल को क्या कहिएबा-वफ़ा न हरजाईफिर भी लोग दीवानेआ गए हैं समझानेअपनी वहशत-ए-दिल केबुन लिए हैं अफ़्सानेख़ुश-ख़याल दुनिया नेगर्मियाँ तो जाती हैंवो रुतें भी आती हैंजब मलूल रातों मेंदोस्तों की बातों मेंजी न चैन पाएगाऔर ऊब जाएगाआहटों से गूँजेगीशहर-ए-दिल की पिन्हाईऔर चाँद-रातों मेंचाँदनी के शैदाईहर बहाने निकलेंगेआरज़ू की गीराईढूँडने को रुस्वाईसर्द सर्द रातों कोज़र्द चाँद बख़्शेगाबे-हिसाब तन्हाईबे-हिजाब तन्हाईशहर-ए-दिल की गलियों में
कट गया दिन ढली शाम शब आ गईफिर ज़मीं अपने महवर से हटने लगीचाँदनी करवटें फिर बदलने लगीआहटों के सिसकते हुए शोर सेफिर मकाँ भर गयाज़हर सपनों का पी करकोई आज की रात फिर मर गया!
रात की कोख सेसुब्ह की एक नन्ही किरन ने जनम यूँ लियाशब ने नन्ही शफ़क़ की गुलाबी हसीं मुट्ठियाँ खोल करकुछ लकीरें पढ़ींऔर सबा से न मालूम चुपके से क्या कह दियायूँ कि शबनम की आँखों से आँसू बहेइक सितारा हँसाचाँदनी मुस्कुराती हुई चल पड़ीऔर नक़ाहत से पहलू बदलते हुएचौंक कर मेरी माँ ने बड़े शौक़ सेकुछ इशारा कियाआहटों और सरगोशियों में किसी ने कहाआह लड़की है ये
मुज़्महिल चाँद की शुआ'ओं मेंबीते लम्हों की याद रक़्साँ हैजाने किन माह-ओ-साल का सायावक़्त की आहटों पे लर्ज़ां है
मैं तेरी याद के जादू में था सहर मुझ कोन-जाने कौन सी मंज़िल पे ला के छोड़ गईकि साँस साँस में तेरे बदन की ख़ुशबू हैक़दम क़दम पे तिरी आहटों का डेरा हैमगर नज़र में फ़क़त शब-ज़दा सवेरा हैतही तही से मनाज़िर हैं गर्द गर्द फ़ज़ामता-ए-उम्र वही एक ख़्वाब तेरा है
ख़िज़ाँ मौसम नहीं हैएक लम्हा है कि जिस की आरज़ू मेंसब्ज़ पत्तेहवा की आहटों पर कान धरते हैंगुज़रते वक़्त में साअत-ब-साअतनए पैराहनों मेंगुलाबी और गहरे सुर्ख़ उन्नाबीदहकते ख़ुशनुमा रंगों से ले कर ज़र्द होने तककभी धीमे कभी ऊँचे सुरों में बात करतीख़ुशबुओं में बस-बसा करहवा के साथ महव-ए-रक़्स होना चाहते हैंज़मीं का रिज़्क़ बन जाने से पहलेवही इक अजनबी वारफ़्तगी और रक़्स का लम्हाकहीं पर दौर-ए-आइंदा के मौसम की समाअ'त मेंकिसी सोए हुए इक बीज मेंख़्वाहिश नुमू की सर उठाती हैबहुत ही प्यार से हर शाख़ के पत्ते से कहती हैकि अब रिज़्क़-ए-ज़मीं बन करकिसी इक नर्म कोंपल की नुमू का आसरा बन जाख़िज़ाँ मौसम नहीं हैइक मसर्रत-ख़ेज़ तख़्लीक़-ए-अमल का आसरा है
ये सब ने देखाकि साज़-ए-गुल से निकल के ख़ुश्बू का एक झोंकाहज़ार नग़्मे सुना गया हैमगर किसी को नज़र न आया कि इस के पर्दे में गुल ने अपनातमाम जौहर लुटा दिया हैये मेरी सोचों की सब्ज़ ख़ुश्बूये मेरी नज़्में ये मेरा जौहरये मेरे लफ़्ज़ों के शाहज़ादेये मेरी आवाज़ के मुसाफ़िरनिकल के होंटों की वादियों सेख़मोशियों के मुहीब जंगल में आहटों के फ़रेब खातेनशात-ए-मंज़िल की जुस्तुजू मेंउदास रस्तों पे चल रहे हैंसफ़र के दोज़ख़ में जल रहे हैं
मैं भटका हुआ इक मुसाफ़िररह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल से ना-आश्नाई पे नाज़ाँतआक़ुब में अपनी ही परछाइयों के रवाँ थामेरे जिस्म का बोझ धरती सँभाले हुए थीमगर उस की रानाइयों से मुझे कोई दिल-बस्तगी ही नहीं थीकभी राह चलते हुए ख़ाक की रूह-परवर कशिशमैं ने महसूस की ही नहीं थीमैं आँखों से बीना था लेकिनमेरे चार-सू चादरें आइनों की तरह थींकि जिन के लिए मेरा परतव ही था इक ज़िंदा हक़ीक़तकिसी दूसरे को गवारा न थी इस में शिरकतमैं कानों से बहरा नहीं थामगर जिस तरह कोहना गुम्बद में चमगादड़ों के भटकने की आवाज़ गूँजती नहीं हैखुले आसमाँ के परिंदों की चहकार अंदर पहुंचती नहीं हैइसी तरह मेरा भी ज़ौक़-ए-समाअत रसा था फ़क़त अपनी ही धड़कनों तकबस अपने लहू की सुबुक आहटों तकमैं भटका हुआ इक मुसाफ़िरमेरी राह पर मिट चुके थे सफ़र के इशारात सारेफ़रामोशियों की घनी धुँद में खो चुके थे जिहत के निशानात सारेरह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल से मैं आश्ना ही नहीं थामगर मैं अकेलाकरोड़ों की इस भीड़ में भी उदास और अकेलातआक़ुब में अपनी ही परछाइयों के रवाँ थामैं शायद हमेशा यूँही अपनी परछाइयों के तआक़ुब में हैरान फिरताअगर रौशनी मुझ पे चमकी न होतीमुबारक वो साअत कि जब मौत और तीरगी के घने साएबाँ के तलेरौशनी मुझ पे चमकीमेरे दिल पे धरती ने और उस के अरफ़ा मज़ाहिर ने अपनी मोहब्बत रक़म कीमुबारक वो साअत कि जब बर्क़ के कोड़े लहरातीलोहे की चीलों से औरआतिशीं तीर बरसाते फ़ौलाद के पर दरिंदों से मुढभेड़ मेंमैं ने देखेमेरे साथियों के जिगर में तराज़ू हैं जो तीरहुआ हूँ मैं ख़ुद उन का नख़चीरजो क़तरा लहू का गिरा उन के तन सेबहा है वो मेरे बदन सेमुबारक वो साअत कि जब मैं ने जानामिरी धड़कनों में करोड़ों दिलों की सदा हैमेरी रूह में मुश्तरक ''गरचे क़ालिब जुदा है''
हुजूम हैकि आग के पहाड़ से गिरा हुआ अलाव हैकोई नहीं जो कह सकेकि एक पल को ठहर कर बताओ तोकहाँ चले हो, किस तरफ़हुजूम क्या हैबे-शुमार मुंतशिर अकेले-पन की भीड़ हैजो आप अपनी आहटों के डर से लड़खड़ा गईग़ुबार-ए-नक़्श-ए-पा उठातो जम गया ग़िलाफ़-ए-चश्म-ओ-गोश परये क़ाफ़िला भटक रहा है मंज़िलों को रख के अपने दोश परनहीं किसी को होश, परकोई तो हो जो कह सकेकि ''आज़मीन-ए-बे-जिहत''!न मंज़िलें न रास्तेतो फिर ग़ुबार बन के उड़ रहे हो किस के वास्तेकिसी ने कह दिया तो क्यानशेब में तो तेज़-तर हुजूम का बहाव हैपहाड़ के दबाव से नशेब में कटाव हैकटाव के सफ़र में कब कहाँ कोई पड़ाव हैअज़ाब-ए-मुश्तइल में अब न नूह है न नाव हैपता है?नहीं फ़क़त अलाव हैऔर आग के पहाड़ से गिरा हुआ अलाव है
अनार कलीतेरे मक़बरे के अहाते मेंकिस क़दर शोर-ओ-ग़ुल हैमैं जब भी ख़ुद को तन्हा उदास पाती हूँऔर दफ़्तरी चाय काफ़ी से दिल भरने लगेअख़बार भी अलमारी के कोने की ज़ीनत बनेकोई किताब भी मेरा दिल न बहला सकेतो मैं अपने कमरे की खिड़की खोलेजहाँ से तेरा मक़बरा साफ़ दिखाई देता हैतेरे बारे में सोचती हूँ औरउदास मोहब्बत भरी दास्तान में खो जाती हूँमैं सोचती हूँ कितेरे मक़बरे को भी यहीं पर होना थाइन अफ़सरों के कमरों और ज़ेहनों मेंफ़ाइलों के सिवा कुछ भी तो नहींमोहब्बत यहाँ आ कर दम तोड़ जाती हैतेरे आस पास किस क़दर घुटन हैतेरी ख़ुशबू क्या कभी किसी को आती होगीतेरी दास्ताँ किस को याद होगीचाय की मेज़ परक़हक़हों और फ़ाइलों के अम्बार मेंकौन तारीख़ के इन सफ़्हात को खँगालता होगाकौन सुनता होगा तेरी आहटों के साए यहाँमगर मैंअक्सर अपने कमरे की खिड़की खोले
सुकूत-ए-वस्ल में कहींकलाइयों के दरमियाँचटख़ती चुभती चूड़ियाँचटख़ती चुभती चूड़ियों मेंइल्तिजा वफ़ा दुआअधूरी शब की ख़ामुशीमें आहटों की हिचकियाँऔर आहटों की हिचकियों मेंआग रौशनी बदन
चश्म-ए-हैरत मेंज़ख़्मों और लाशों का जो समुंदरठहर ठहर कर डरा रहा हैमैं उस के साहिल पे बैठे बैठे आने वाले लोगों की ख़ातिरदो चार नज़्में लिख रहा हूँअगर में ऐसा न करूँ तोमुझे बताओ कि क्या करूँ मैंअहद-ए-हाज़िर के ख़ुश्क दामनसुर्ख़ लाशों से भर गए हैंअगर कुछ इस के सिवा बचा है तो बस मशीनों का शोर सा हैफ़ज़ा में धुआँ घुला हुआ हैमैं उन फ़ज़ाओं में घट रहा हूँदो चार नज़्में लिख रहा हूँअगर मैं ऐसा न करूँ तोमुझे बताओ कि क्या करूँ मैंमेरे अज़ीज़ो मेरे रफ़ीक़ोआओ मिल कर जतन करें येउम्मीद की लौ बढ़ाए रक्खेंहसीन मौसमों की आहटों परकान अपना लगाए रक्खेंउफ़ुक़ पे नज़रें जमाए रक्खेंउम्मीद रखनायहाँ से एक दिन नया सवेरानए उजालों के साथ हो करनई उमंगों के हाथ थामेमौसमों को बदल ही देगाकान अपना लगाएउफ़ुक़ पे नज़रें जमाए रखना
कभी वक़्त की साँस मेंहोंट उलझा के देखे हैं तुम नेकि इस बद-गुमाँ मौसमों के मुग़न्नी की तानेंनिहाँ ख़ाना-ए-दिल मेंगहरी ख़मोशी की हैबत गिराती चली जा रही हैंअज़ल से अबद तक बिफरते हुएसैल-ए-बे-माइगी में कभीदिल उखड़ते हुए शहर गिरते हुएदेख पाए हो तुमकभी भीगे भीगे से दीवार-ओ-दर मेंकि बचपन की गलियों मकानों मेंबारिश की आवाज़ से दिल दहलते हुएकिसी मुश्तरक ख़ौफ़ की आहटों सेधड़कते हुए बाम-ओ-दर और ज़ीनेमुसलसल हवा और बारिश की आवाज़ चलती हुईकभी मुँह-अँधेरे की तक़्दीस मेंदूर से आती गाड़ी की सीटी को सुनते हुएतुम ने सोचा है उन के लिएजिन के क़दमों में मंज़िलमुसलसल अज़ाब और ख़्वाबों से ता'बीर तक दूर हैकभी शाम की सनसनाती हवा मेंठिठुरती ख़मोशी की सहमी सदा सुन केदरवाज़ा खोला है उन के लिएजिन के हाथों की लर्ज़िश में दस्तक नहींमुझे पूछना हैकि खुलते हुए फूल चलती हवाऔर गुज़रे मह-ओ-साल की दस्तकों परन हो सकने वालों पे आँसू बहाए हैं तुम नेकि मैंरात की एक हिचकी में ठहरी हुई साँस हूँऔर तुम्हारी घनी नींद के बाज़ुओं सेफिसलता हुआ लम्स हूँ
हवा हर इक सम्त बह रही हैजिलौ में कूचे मकान ले करसफ़र के बे-अंत पानियों की थकान ले करजो आँख के इज्ज़ से परे हैंउन्ही ज़मानों का ज्ञान ले करतिरे इलाक़े की सरहदों के निशान ले करहवा हर इक सम्त बह रही हैज़मीन चुपआसमान वुसअ'त में खो गया हैफ़ज़ा सितारों की फ़स्ल से लहलहा रही हैमकाँ मकीनों की आहटों से धड़क रहे हैंझुके झुके नम-ज़दा दरीचों मेंआँख कोई रुकी हुई हैफ़सील-ए-शहर-ए-मुराद परना-मुराद आहट अटक गई हैये ख़ाक तेरी मिरी सदा के दयार मेंफिर भटक गई हैदयार शाम-ओ-सहर के अंदरनिगार-ए-दश्त-ओ-शजर के अंदरसवाद-ए-जान-ओ-नज़र के अंदरख़मोशी बहर-ओ-बर के अंदररिदा-ए-सुब्ह-ए-ख़बर के अंदरअज़िय्यत रोज़-ओ-शब मेंहोने की ज़िल्लतों में निढाल सुब्हों कीओस में भीगती ठिठुरतीख़मोशियों के भँवर के अंदरदिलों से बाहरदिलों के अंदरहवा हर इक सम्त बह रही है
बादलों के ख़ून से चिपकी हुई इस शाम मेंउड़ रहे थेकुछ परिंदेलड़खड़ाती आहटों केकारवाँ के साथ मेंशहर गर्दी में रहाघर का रस्ता याद आता ही न थाकिस क़दर मैं डर गया थानींद की ख़ामोशियों के शोर से
किसी भूले नाम का ज़ाइक़ाकिसी ज़र्द दिन की गिरफ़्त मेंकिसी खोए ख़्वाब का वसवसाकिसी गहरी शब की सरिश्त मेंकहीं धूप छाँव के दरमियाँकिसी अजनबी से दयार केमैं जवार में फिरूँ किस तरहये हवा चलेगी तो कब तलकये ज़मीं रहेगी तो कब तलकखुले आँगनों पेमुहीब रात झुकी रहेगी तो कब तलकये जो आहटों का हिरास हैउसे अपने मैले लिबास सेमैं झटक के फेंक दूँ किस तरहवो जो मावरा-ए-हवास हैउसे रोज़-ओ-शब के हिसाब सेकरूँ दे दिमाग़ में किस तरहकोई आँसुओं की ज़बाँ नहींकोई मासवा-ए-गुमाँ नहींये जो धुँदली आँखों में डूबता कोई नाम हैये कहीं नहींये कहाँ नहींये क़याम-ए-ख़्वाब दवाम-ए-ख़्वाबरहूँ इस से दौर में किस तरहउन्ही साहिलों पेतड़पती रेत में सो रहूँमुझे इज़्न-ए-ज़िल्लत-ए-हस्त हो
भारी बूटों-तले रौंदते जाइएकोंपलों के बदन आहटों के दिएभारी बूटों-तले रौंदते जाइए
दिए हर आने वाले सेतुमहारा पूछते हैंऔर दरवाज़े तुम्हारी आहटों में गुम मगर तुमदूरियों के शहर से भीदूर बैठे होजहाँ आवाज़ भी जाने से डरती है
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