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नज़्म
देख तुझ पर इल्म की भरपूर पड़ जाए न ज़र्ब
भाग इस पर्दे में हैं शैतान के आलात-ए-हर्ब
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सभी आलात-ए-जर्राही को मैं ने आज़माया है
मगर वो केंचुली है हस्ती-ए-ख़ुद की अजब आशिक़
ख़ावर नक़ीब
नज़्म
चमकते हुए सब बुतों को मिटा दो
कि अब लौह-ए-दिल से हर इक नक़्श हर्फ़-ए-ग़लत की तरह मिट चुका है