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नज़्म
आमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीत
तुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा है
या सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
क्या तुझे भी इंतिज़ार-ए-आमद-ए-महबूब है
क्यों परेशाँ इस क़दर है क्या तुझे मतलूब है
साक़िब कानपुरी
नज़्म
उमीद-ए-सुब्ह के ख़ंजर से ज़ख़्मी हो के जाएँगे?
(कहाँ जा कर रुकेगा क़ाफ़िला इन सोगवारों का)
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
पास था अपने क़ौल का जिस को तू ने कुछ उस का पास किया
आमद-ओ-रफ़्त-ए-देरीना का भूल के भी एहसास किया