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नज़्म
हर शाम यहाँ शाम-ए-वीराँ आसेब-ज़दा रस्ते गलियाँ
जिस शहर की धुन में निकले थे वो शहर दिल-ए-बर्बाद कहाँ
हबीब जालिब
नज़्म
हैं जूया किसी अज़्मत-ए-ना-रसा के
उन्हें क्या ख़बर कैसा आसेब-ए-मुबरम मेरे ग़ार सीने पे था
नून मीम राशिद
नज़्म
शिकस्ता ख़्वाहिशों के अन-गिनत आसेब बस्ते हैं
जो आधी शब तो रोते हैं फिर आधी रात हँसते हैं
रहमान फ़ारिस
नज़्म
यहाँ उस्मान बाबा वाला ऊँचा ता'ज़िया अब भी खड़ा होता है
जिस की झिलमिलाहट मेरे अंदर ऐसे रक़्साँ है