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नज़्म
जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी तोड़ दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सुनो तफ़रीक़ कैसे हो भला अश्ख़ास ओ अश्या में
बहुत जंजाल हैं पर हो यहाँ तो ''या'' में और ''या'' में
जौन एलिया
नज़्म
ये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदा
कि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उस नार में ऐसा रूप न था जिस रूप से दिन की धूप दबे
इस शहर में क्या क्या गोरी है महताब-रुख़े गुलनार-लबे
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
और जब याद की बुझती हुई शम्ओं में नज़र आया कहीं
एक पल आख़िरी लम्हा तिरी दिलदारी का