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नज़्म
''कोई माशूक़ ब-सद-शौकत-ओ-नाज़ आता है
सुर्ख़ बैरक़ है समुंदर में जहाज़ आता है''
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कभी अपनी अदा-ए-दिल-नवाज़ी को नहीं छोड़ा
इसे तख़रीब के हर वार ने ता'मीर का इरफ़ान बख़्शा है
बलराज कोमल
नज़्म
ज़िंदगी को नागवार इक सानेहा जाने हुए
बज़्म-ए-किबर-ओ-नाज़ में फ़र्ज़ अपना पहचाने हुए