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नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात में
बैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनात!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अजल क्या जाने फ़र्क़ अहल-ए-हरम और दैर वालों का
बिला तफ़रीक़ शैख़-ओ-बरहमन की आज़माइश है
फ़ज़लुर्रहमान
नज़्म
ये चीख़ती हुई रूहें ये हसरतों के सनम
ये बज़्म-ए-कुफ़्र-ओ-यक़ीं ये जहान-ए-दैर-ओ-हरम