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नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आओ ऐ अहल-ए-ख़िरद अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-ज़मीं
बज़्म-ए-हस्ती में मोहब्बत से चराग़ाँ कर दें
दर्शन सिंह
नज़्म
कूचा-ए-'दाग़' से हो कर जो चला हुस्न-ए-ख़याल
शा'इर-ए-अहल-ए-नज़र अहल-ए-ज़बाँ याद आया
कामिल चाँदपुरी
नज़्म
ज़मीन अहल-ए-ज़मीन अफ़्लाक अहल-ए-अफ़्लाक
अपनी अपनी मुअ'य्यना साअ'तों में ऐसे गुज़र रहे हैं
ज़िया जालंधरी
नज़्म
जो निगाह-ए-अहल-ए-सर्वत में हक़ीर-ओ-पाएमाल
ज़िंदगानी वक़्फ़ थी जिस की बराए अहल-ए-ज़र