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नज़्म
जम्हूरियत-नवाज़ बशर-दोस्त अम्न-ख़्वाह
ख़ुद को जो ख़ुद दिए थे वो अलक़ाब क्या हुए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ख़ुसरव-ए-फ़िक्र ओ शहंशाह-ए-तख़य्युल कहिए
फिर भी मिन्नत-कश-ए-अलक़ाब है 'ग़ालिब' की ग़ज़ल
मोहम्मद अब्दुल क़ादिर अदीब
नज़्म
चिड़ियों की तरह दाने पे गिरता है किस लिए
पर्वाज़ रख बुलंद कि तू बन सके उक़ाब
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
लेकिन मेरा ग़ुस्सा किस शेर के बदन में झरझराता है?
मेरी आग किस उक़ाब की आँखों में कपकपाती है?
ज़ाहिद इमरोज़
नज़्म
ˈफ़ॉवड् जाता हूँ मैं गुगली उठाने के लिए
अक़ब में अपने मगर विकटें गिरी पाता हूँ मैं