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नज़्म
क्यूँ जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी भारी के
जब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी के
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मीराजी
नज़्म
कभी डाँटो कि मैं इस तरह क्यूँ पैसे उड़ाता हूँ
जिन्हें तुम टोकते थे मैं वो सारे काम करता हूँ
मनोज अज़हर
नज़्म
नई ख़ुश्बू लिए मुझ को जगाने के लिए आए
जिधर भी आँख उठाता हूँ शफ़क़ की मुस्कुराहट है
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
कोई दम में हयात-ए-नौ का फिर परचम उठाता हूँ
ब-ईमा-ए-हमिय्यत जान की बाज़ी लगाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सूखा चेहरा दहक़ानों का, ज़ख़्मी पीठें मज़दूरों की
वो भूखों के अन-दाता हैं, हक़ उन का है बे-दाद करें
जमील मज़हरी
नज़्म
क़मर अब्बास क़मर
नज़्म
जिए जाता है आख़िर कौन उस के घर में है जिस के
लिए ये सख़्तियाँ सहता है तकलीफ़ें उठाता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
ज़र्द परचम उड़ाता हुआ लश्कर-ए-बे-अमाँ गुल-ज़मीनों को पामाल करता रहा
और हवा चुप रही