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नज़्म
अब मैं अल्ताफ़ ओ इनायत का सज़ा-वार नहीं
मैं वफ़ादार नहीं हाँ मैं वफ़ादार नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फूट निकला दर-ओ-दीवार से सैलाब-ए-नशात
अल्लाह अल्लाह मिरा कैफ़-ए-नज़र आज की रात
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत
है रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे नेमत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
अल्ताफ़ जिन्हों पर हैं उन के सो ख़ूबी हासिल है उन को
हर आन 'नज़ीर' अब याँ तुम भी तो बाबा नानक शाह कहो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
बानियों ने था बनाया इस लिए गोया हमें
हम को जब देखें ख़लफ़ अस्लाफ़ को रोया करें
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
बे-ज़ार ज़िंदगी से हैं पीर ओ जवाँ सभी
अल्ताफ़-ए-शहरयार के हैं नौहा-ख़्वाँ सभी
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
जो इल्म मर्दों के लिए समझा गया आब-ए-हयात
ठहरा तुम्हारे हक़ में वो ज़हर-ए-हलाहिल सर-बसर
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
कहते हैं आज़ाद हो जाता है जब लेता है साँस
याँ ग़ुलाम आ कर करामत है ही इंग्लिस्तान की