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नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
मरने वालों का मातम भी करता रहा
ये निफ़ाक़-ए-तरहदार-ए-अहल-ए-सितम तो रिवायत में सदियों से मन्क़ूल है
मोहम्मद अहमद
नज़्म
कभी ग़नीम-ए-जौर-ओ-सितम के हाथों खाई ऐसी मात
अर्ज़-ए-अलम में ख़्वार हुए हम बिगड़े रहे बरसों हालात