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नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
कोई अंजुम आसमाँ का और सुबुक परवाज़-ए-शौक़
रहनुमा है क्या तिरा दिल-दादा-ए-अंदाज़-ए-शौक़
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
तख़्ता-ए-मश्क़-ए-सितम क़ैदी-ए-ज़ंजीर हूँ मैं
सैकड़ों दुश्मन-ए-सफ़्फ़ाक लगे हैं पीछे
उरूज क़ादरी
नज़्म
मुशाएरा ब-जुज़ अंदाज़-ए-हाव-हू क्या है
''तुम्हारे शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
देखो हम कैसे बसर की इस आबाद ख़राबे में
कभी ग़नीम-ए-जौर-ओ-सितम के हाथों खाई ऐसी मात
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
हामी-ए-जौर-ओ-सितम हर तरह माला-माल था
जिस की लाठी थी उसी की भैंस थी ये हाल था