aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगामैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू मेंरोज़ की तरह से वो आज भी आया होगाऔर जब उस ने वहाँ मुझ को न पाया होगा!?
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगीवो किन ख़्वाबों से जाने आश्ना ना-आश्ना होगीतुम्हारे दिल के इस दुनिया से कैसे सिलसिले होंगेतुम्हें कैसे गुमाँ होंगे तुम्हें कैसे गिले होंगेतुम्हारी सुब्ह जाने किन ख़यालों से नहाती होतुम्हारी शाम जाने किन मलालों से निभाती होन जाने कौन दोशीज़ा तुम्हारी ज़िंदगी होगीन जाने उस की क्या बायसतगी शाइस्तगी होगीउसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगेन जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगीये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा हैये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा हैवो हँसती हो तो शायद तुम न रह पाते हो हालों मेंगढ़ा नन्हा सा पड़ जाता हो शायद उस के गालों मेंगुमाँ ये है तुम्हारी भी रसाई ना-रसाई होवो आई हो तुम्हारे पास लेकिन आ न पाई होवो शायद माइदे की गंद बिरयानी न खाती होवो नान-ए-बे-ख़मीर-ए-मैदा कम-तर ही चबाती होवो दोशीज़ा भी शायद दास्तानों की हो दिल-दादाउसे मालूम होगा 'ज़ाल' था 'सोहराब' का दादातहमतन यानी 'रुस्तम' था गिरामी 'साम' का वारिसगिरामी 'साम' था सुल्ब-ए-नर-ए-'मानी' का ख़ुश-ज़ादा(ये मेरी एक ख़्वाहिश है जो मुश्किल है)वो 'नज्म'-आफ़ंदि-ए-मरहूम को तो जानती होगीवो नौहों के अदब का तर्ज़ तो पहचानती होगीउसे कद होगी शायद उन सभी से जो लपाड़ी होंन होंगे ख़्वाब उस का जो गवय्ये और खिलाड़ी हों
ख़ून अपना हो या पराया होनस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िरजंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब मेंअम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर
हवा भी ख़ुश-गवार हैगुलों पे भी निखार हैतरन्नुम-ए-हज़ार हैबहार पुर-बहार हैकहाँ चला है साक़ियाइधर तो लौट इधर तो आअरे ये देखता है क्याउठा सुबू सुबू उठासुबू उठा प्याला भरप्याला भर के दे इधरचमन की सम्त कर नज़रसमाँ तो देख बे-ख़बरवो काली काली बदलियाँउफ़ुक़ पे हो गईं अयाँवो इक हुजूम-ए-मय-कशाँहै सू-ए-मय-कदा रवाँये क्या गुमाँ है बद-गुमाँसमझ न मुझ को ना-तवाँख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँअभी तो मैं जवान हूँइबादतों का ज़िक्र हैनजात की भी फ़िक्र हैजुनून है सवाब काख़याल है अज़ाब कामगर सुनो तो शैख़ जीअजीब शय हैं आप भीभला शबाब ओ आशिक़ीअलग हुए भी हैं कभीहसीन जल्वा-रेज़ होंअदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ होंहवाएँ इत्र-बेज़ होंतो शौक़ क्यूँ न तेज़ होंनिगार-हा-ए-फ़ित्नागरकोई इधर कोई उधरउभारते हों ऐश परतो क्या करे कोई बशरचलो जी क़िस्सा-मुख़्तसरतुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़रदुरुस्त है तो हो मगरअभी तो मैं जवान हूँये गश्त कोहसार कीये सैर जू-ए-बार कीये बुलबुलों के चहचहेये गुल-रुख़ों के क़हक़हेकिसी से मेल हो गयातो रंज ओ फ़िक्र खो गयाकभी जो बख़्त सो गयाये हँस गया वो रो गयाये इश्क़ की कहानियाँये रस भरी जवानियाँउधर से मेहरबानियाँइधर से लन-तरानियाँये आसमान ये ज़मींनज़ारा-हा-ए-दिल-नशींइन्हें हयात-आफ़रींभला मैं छोड़ दूँ यहींहै मौत इस क़दर क़रींमुझे न आएगा यक़ींनहीं नहीं अभी नहींअभी तो मैं जवान हूँन ग़म कुशूद ओ बस्त काबुलंद का न पस्त कान बूद का न हस्त कान वादा-ए-अलस्त काउम्मीद और यास गुमहवास गुम क़यास गुमनज़र से आस पास गुमहमा-बजुज़ गिलास गुमन मय में कुछ कमी रहेक़दह से हमदमी रहेनशिस्त ये जमी रहेयही हमा-हामी रहेवो राग छेड़ मुतरिबातरब-फ़ज़ा, अलम-रुबाअसर सदा-ए-साज़ काजिगर में आग दे लगाहर एक लब पे हो सदान हाथ रोक साक़ियापिलाए जा पिलाए जाअभी तो मैं जवान हूँ
हैं लाखों रोग ज़माने में क्यूँ इश्क़ है रुस्वा बे-चाराहैं और भी वजहें वहशत की इंसान को रखतीं दुखियाराहाँ बे-कल बे-कल रहता है हो पीत में जिस ने जी हारापर शाम से ले कर सुब्ह तलक यूँ कौन फिरेगा आवाराये बातें झूटी बातें ये लोगों ने फैलाईं हैंतुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं
इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवानाइक नार पे जान को हार गया मशहूर है उस का अफ़साना
छोटा सा इक गाँव था जिस मेंदिए थे कम और बहुत अँधेराबहुत शजर थे थोड़े घर थेजिन को था दूरी ने घेराइतनी बड़ी तन्हाई थी जिस मेंजागता रहता था दिल मेराबहुत क़दीम फ़िराक़ था जिस मेंएक मुक़र्रर हद से आगेसोच न सकता था दिल मेराऐसी सूरत में फिर दिल कोध्यान आता किस ख़्वाब में तेराराज़ जो हद से बाहर में थाअपना-आप दिखाता कैसेसपने की भी हद थी आख़िरसपना आगे जाता कैसे
शा'इरसाहिल-ए-दरिया पे मैं इक रात था महव-ए-नज़रगोशा-ए-दिल में छुपाए इक जहान-ए-इज़तिराबशब सुकूत-अफ़्ज़ा हवा आसूदा दरिया नर्म सैरथी नज़र हैराँ कि ये दरिया है या तस्वीर-ए-आबजैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वारमौज-ए-मुज़्तर थी कहीं गहराइयों में मस्त-ए-ख़्वाबरात के अफ़्सूँ से ताइर आशियानों में असीरअंजुम-ए-कम-ज़ौ गिरफ़्तार-ए-तिलिस्म-ए-माहताबदेखता क्या हूँ कि वो पैक-ए-जहाँ-पैमा ख़िज़्रजिस की पीरी में है मानिंद-ए-सहर रंग-ए-शबाबकह रहा है मुझ से ऐ जूया-ए-असरार-ए-अज़लचश्म-ए-दिल वा हो तो है तक़्दीर-ए-आलम बे-हिजाबदिल में ये सुन कर बपा हंगामा-ए-मशहर हुआमैं शहीद-ए-जुस्तुजू था यूँ सुख़न-गुस्तर हुआऐ तिरी चश्म-ए-जहाँ-बीं पर वो तूफ़ाँ आश्कारजिन के हंगामे अभी दरिया में सोते हैं ख़मोशकश्ती-ए-मिस्कीन-ओ-जान-ए-पाक-ओ-दीवार-ए-यतीमइल्म-ए-मूसा भी है तिरे सामने हैरत-फ़रोशछोड़ कर आबादियाँ रहता है तू सहरा-नवर्दज़िंदगी तेरी है बे-रोज़-ओ-शब-ओ-फ़र्दा-ओ-दोशज़िंदगी का राज़ क्या है सल्तनत क्या चीज़ हैऔर ये सरमाया-ओ-मेहनत में है कैसा ख़रोशहो रहा है एशिया का ख़िरक़ा-ए-देरीना चाकनौजवाँ अक़्वाम-ए-नौ-दौलत के हैं पैराया-पोशगरचे अस्कंदर रहा महरूम-ए-आब-ए-ज़िंदगीफितरत-ए-अस्कंदरी अब तक है गर्म-ए-नाओ-नोशबेचता है हाशमी नामूस दीन-ए-मुस्तफ़ाख़ाक-ओ-ख़ूँ में मिल रहा है तुर्कमान-ए-सख़्त-कोशआग है औलाद-ए-इब्राहीम है नमरूद हैक्या किसी को फिर किसी का इम्तिहाँ मक़्सूद हैजवाब-ए-ख़िज़रसहरा-नवर्दी
गुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शामधुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए-महताब से रातऔर मुश्ताक़ निगाहों की सुनी जाएगीऔर उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हातउन का आँचल है कि रुख़्सार कि पैराहन हैकुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगींजाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छाँव मेंटिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहींआज फिर हुस्न-ए-दिल-आरा की वही धज होगीवही ख़्वाबीदा सी आँखें वही काजल की लकीररंग-ए-रुख़्सार पे हल्का सा वो ग़ाज़े का ग़ुबारसंदली हाथ पे धुंदली सी हिना की तहरीरअपने अफ़्कार की अशआर की दुनिया है यहीजान-ए-मज़मूँ है यही शाहिद-ए-मअ'नी है यहीआज तक सुर्ख़ ओ सियह सदियों के साए के तलेआदम ओ हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है?मौत और ज़ीस्त की रोज़ाना सफ़-आराई मेंहम पे क्या गुज़रेगी अज्दाद पे क्या गुज़री है?इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़्लूक़क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती हैये हसीं खेत फटा पड़ता है जौबन जिन का!किस लिए इन में फ़क़त भूक उगा करती हैये हर इक सम्त पुर-असरार कड़ी दीवारेंजल-बुझे जिन में हज़ारों की जवानी के चराग़ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहेंजिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगेलेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंटहाए उस जिस्म के कम्बख़्त दिल-आवेज़ ख़ुतूतआप ही कहिए कहीं ऐसे भी अफ़्सूँ होंगे
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरीख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरीये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरीउठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरीउड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरीटपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरीइलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरीमिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ कावो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरीदरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारमज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारमरियाज़-ए-दहर में ना-आश्ना-ए-बज़्म-ए-इशरत हूँख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम-ए-मसर्रत हूँमिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाईमैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँपरेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलतासिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत कासरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त-ए-ख़ाक-ए-सहरा नेकिसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँनज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए-हस्तीमैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँन सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमानामैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँमुझे राज़-ए-दो-आलम दिल का आईना दिखाता हैवही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता हैअता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों मेंकि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों मेंअसर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ कामिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों मेंरुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ कोकि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों मेंदिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोयालिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों मेंनिशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचींतिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों मेंछुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं नेअनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों मेंसुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस कोवज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों मेंवतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली हैतिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों मेंज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला हैधरा क्या है भला अहद-ए-कुहन की दास्तानों मेंये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा करज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों मेंन समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालोतुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों मेंयही आईन-ए-क़ुदरत है यही उस्लूब-ए-फ़ितरत हैजो है राह-ए-अमल में गामज़न महबूब-ए-फ़ितरत हैहुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगालहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगाजलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ सेतिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगामगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना पैदाचमन में मुश्त-ए-ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगापिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों कोजो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगामुझे ऐ हम-नशीं रहने दे शग़्ल-ए-सीना-कावी मेंकि मैं दाग़-ए-मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगादिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा हैतुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगाजो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती हैज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती हैकिया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू नेगुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा तू नेरहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों कोकिया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू नेफ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं परमगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू नेतअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने मेंये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू नेसरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जासपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू नेसफ़ा-ए-दिल को क्या आराइश-ए-रंग-ए-तअल्लुक़ सेकफ़-ए-आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू नेज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू नेज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिलबनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू नेकुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखाअरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू नेहवस बाला-ए-मिम्बर है तुझे रंगीं-बयानी कीनसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना-ख़्वानी कीदिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम कोजो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम कोज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल-हवस मक़्सद नहीं उस काबनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म-ए-आदम कोअगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखानज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम कोशजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस काये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम कोन उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भीये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम कोफिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ मेंये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम कोमोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता हैज़रा से बीज से पैदा रियाज़-ए-तूर होता हैदवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए-आरज़ू रहनाइलाज-ए-ज़ख़्म है आज़ाद-ए-एहसान-ए-रफ़ू रहनाशराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरीशिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहनाथमे क्या दीदा-ए-गिर्यां वतन की नौहा-ख़्वानी मेंइबादत चश्म-ए-शाइर की है हर दम बा-वज़ू रहनाबनाएँ क्या समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशियाँ अपनाचमन में आह क्या रहना जो हो बे-आबरू रहनाजो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत मेंग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहनाये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र कोतुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहनान रह अपनों से बे-परवा इसी में ख़ैर है तेरीअगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना-ख़ू रहनाशराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ कीसिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहनामोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों नेकिया है अपने बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों नेबयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी हैये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी हैमोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी हैमरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसाछुपा जिस में इलाज-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन भी हैजलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जानाये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम-ए-अंजुमन भी हैवही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय मेंये शीरीं भी है गोया बे-सुतूँ भी कोहकन भी हैउजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों कोमिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी हैसुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्नाज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी हैनमी-गर्दीद को तह रिश्ता-ए-मअ'नी रिहा कर्दमहिकायत बूद बे-पायाँ ब-ख़ामोशी अदा कर्दम
तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से बे-सरोकारतुम्हारी याद के मौसम गुज़रते जाते हैंबस एक मन्ज़र-ए-बे-हिज्र-ओ-विसाल है जिस मेंहम अपने आप ही कुछ रंग भरते जाते हैं
बहुत मैं ने सुनी है आप की तक़रीर मौलानामगर बदली नहीं अब तक मिरी तक़दीर मौलानाख़ुदारा शुक्र की तल्क़ीन अपने पास ही रक्खेंये लगती है मिरे सीने पे बन कर तीर मौलानानहीं मैं बोल सकता झूट इस दर्जा ढिटाई सेयही है जुर्म मेरा और यही तक़्सीर मौलानाहक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें या ख़ुदा जानेसुना है जिम्मी-कार्टर आप का है पीर मौलानाज़मीनें हों वडेरों की मशीनें हों लुटेरों कीख़ुदा ने लिख के दी है ये तुम्हें तहरीर मौलानाकरोड़ों क्यूँ नहीं मिल कर फ़िलिस्तीं के लिए लड़तेदुआ ही से फ़क़त कटती नहीं ज़ंजीर मौलाना
चंद क़दमों के निशाँ हाँ कभी मिलते हैं कहींसाथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चंद क़दमऔर फिर टूट के गिर जाते हैं ये कहते हुएअपनी तन्हाई लिए आप चलो, तन्हा अकेलेसाथ आए जो यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं
कल हम ने सपना देखा हैजो अपना हो नहीं सकता हैउस शख़्स को अपना देखा है
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगागुज़र गया अब वो दौर-ए-साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वालेबनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होगाकभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगेबरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ारज़ार होगासुना दिया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िरजो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगानिकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया थासुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगाकिया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन मेंतो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह-फट है ख़्वार होगादयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं हैखरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगातुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगीजो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगासफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर-ए-ना-तावाँ काहज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगाचमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली कोये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगाजो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखायायही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए'तिबार होगाकहा जो क़ुमरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा-ब-गिल हैंतू ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगाख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारेमैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगाये रस्म-ए-बज़्म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भीरहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे-क़रार होगामैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूँगा अपने दर-माँदा कारवाँ कोशरर-फ़िशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला-बार होगानहीं है ग़ैर-अज़-नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी कातू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगान पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस कीकहीं सर-ए-राहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा
रात भर दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहेसाँस की तरह से आप आते रहे जाते रहेख़ुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आएगाअपना अरमान बर-अफ़गन्दा-नक़ाब आएगानज़रें नीची किए शरमाए हुए आएगाकाकुलें चेहरे पे बिखराए हुए आएगाआ गई थी दिल-ए-मुज़्तर में शकेबाई सीबज रही थी मिरे ग़म-ख़ाने में शहनाई सीपतियाँ खड़कीं तो समझा कि लो आप आ ही गएसज्दे मसरूर कि मा'बूद को हम पा ही गएशब के जागे हुए तारों को भी नींद आने लगीआप के आने की इक आस थी अब जाने लगीसुब्ह ने सेज से उठते हुए ली अंगड़ाईओ सबा! तू भी जो आई तो अकेली आईमेरे महबूब मिरी नींद उड़ाने वालेमेरे मस्जूद मिरी रूह पे छाने वालेआ भी जा, ताकि मिरे सज्दों का अरमाँ निकलेआ भी जा, कि तिरे क़दमों पे मिरी जाँ निकले
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोईतुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोईडरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदरराख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोईइक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगीयूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोईमाना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थेबे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोईसाक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवाअब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोईहर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़मानाक्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोईअर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा केनाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
सच है हमीं को आप के शिकवे बजा न थेबे-शक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे
हुज़ूर आप और निस्फ़ शब मिरे मकान परहुज़ूर की तमाम-तर बलाएँ मेरी जान परहुज़ूर ख़ैरियत तो है हुज़ूर क्यूँ ख़मोश हैंहुज़ूर बोलिए कि वसवसे वबाल-ए-होश हैंहुज़ूर होंट इस तरह से कपकपा रहे हैं क्यूँहुज़ूर आप हर क़दम पे लड़-खड़ा रहे हैं क्यूँहुज़ूर आप की नज़र में नींद का ख़ुमार हैहुज़ूर शायद आज दुश्मनों को कुछ बुख़ार हैहुज़ूर मुस्कुरा रहे हैं मेरी बात बात परहुज़ूर को न जाने क्या गुमाँ है मेरी ज़ात परहुज़ूर मुँह से ब रही है पीक साफ़ कीजिएहुज़ूर आप तो नशे में हैं मुआफ़ कीजिएहुज़ूर क्या कहा मैं आप को बहुत अज़ीज़ हूँहुज़ूर का करम है वर्ना मैं भी कोई चीज़ हूँहुज़ूर छोड़िए हमें हज़ार और रोग हैंहुज़ूर जाइए कि हम बहुत ग़रीब लोग हैं
दुनिया-भर से दूर ये नगरीनगरी दुनिया-भर से निरालीअंदर अरमानों का मेलाबाहर से देखो तो ख़ालीहम हैं इस कुटिया के जोगीहम हैं इस नगरी के वालीहम ने तज रक्खा है ज़मानातुम आना तो तन्हा आना
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