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नज़्म
मन के मंदिर को मुनव्वर करे नूर-ए-इस्लाम
का'बा-ए-दिल में रहे शाम-ओ-सहर राम का नाम
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
मगर क्या कीजिए जब फ़ैसला ये है मशिय्यत का
कि मैं फ़ितरत की आँखों से गिरूँ अश्क-ए-रवाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
फिर उन पे शबनम-ए-अश्क-ए-सहर-गही छिड़कूँ
फिर उन से शे'रों की लड़ियाँ पिरो के नज़्र करूँ
नईम सिद्दीक़ी
नज़्म
लम्हा लम्हा मुसलसल लहू के तसलसुल में जलता रहूँ
उस के रौशन चराग़ों में जश्न-ए-जमाल-ए-तुलू’-ए-सहर तक
बलराज कोमल
नज़्म
दिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आया
या ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहर