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नज़्म
भरी दोपहर में सर अपना जो ढक कर मिलने आती थीं
जो पंखे हाथ के झलती थीं और बस पान खाती थीं
असना बद्र
नज़्म
'ज़ेहरा' ने बहुत दिन से कुछ भी नहीं लिक्खा है
हालाँकि दर-ईं-अस्ना क्या कुछ नहीं देखा है
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
अम्मी कहतीं खेल न खेलो घर के काम में हाथ बटाओ
अब्बू कहते पढ़ने बैठो टी-वी में मत वक़्त गँवाओ
असना बद्र
नज़्म
कोई नज़्म न कहना जब तक तुम पर ये सब ना उतरे
नज़्म का कोई अपना रुत्बा अपना मंसब ना उतरे