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नज़्म
वही कि जिस की महार बाँधी थी तुम ने बोसीदा उस्तुख़्वाँ से
वो अस्प-ए-ताज़ी के उस्तुख़्वाँ थे
अली अकबर नातिक़
नज़्म
मंज़िल-ए-मक़्सूद तक ये क़ौम जा सकती नहीं
जिस के क़ब्ज़े में नहीं अस्प-ए-सियासत की लगाम
अर्श मलसियानी
नज़्म
गूँज टापों की न आबादी न वीराने में है
ख़ैर तो है अस्प-ए-ताज़ी क्या शिफ़ा-ख़ाने में है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
और अब वो नाक़ा के उस्तुख़्वाँ भी
तुम्हारे महरम के अस्प-ए-ताज़ी के उस्तख़्वानों में मिल गए हैं
अली अकबर नातिक़
नज़्म
'अक़ीदत-गाह से माँगी हुई 'ऐनक लगाता हूँ
गुमाँ के अस्प-ए-ताज़ी पर कमाल-ए-बर्क़-रफ़्तारी दिखाता हूँ
आबिद रज़ा
नज़्म
हम बचने की जितनी कोशिश करते हैं फँसते जाते हैं
ये रेग-ए-रवान-ए-उम्र ही कुछ ऐसी है कि धँसते जाते हैं
राशिद आज़र
नज़्म
कैसे समझाऊँ कि उल्फ़त ही नहीं हासिल-ए-उम्र
हासिल-ए-उम्र इस उल्फ़त का मुदावा भी तो है