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नज़्म
उन की समाअ'त क्या है
अपनी बुझती आँखों से राँझा पर्दा-ए-अर्श के पार ख़ुदा को देख के उस पर
आकाश 'अर्श'
नज़्म
सुब्ह फ़र्ग़ाना में थी और हुई रंगों में शाम
आल-ए-तैमूर की आशुफ़्ता-सरी तुझ को सलाम
अर्श मलसियानी
नज़्म
ज़ाद बूम-ए-अर्श रिफ़अत-आश्ना तेरी ख़ाक
'जोश' के ख़ुर्शीद-ए-मा'नी की ज़िया से ताबनाक
अर्श मलसियानी
नज़्म
जब ख़ुर्शीद-ए-आज़ादी की फूटी थी किरन वो दिन आया
चमके थे ज़िया-ए-ख़ास से जब कोहसार-ओ-दमन वो दिन आया
अर्श मलसियानी
नज़्म
अर्श सिद्दीक़ी
नज़्म
फ़लक पर अंजुम-ए-ताबाँ थे मसरूफ़-ए-दरख़शानी
बरसता था ज़मीं पर आसमाँ से नूर का पानी
अर्श मलसियानी
नज़्म
जवानियाँ हैं ज़ोर पर शबाब का ज़ुहूर है
ब-फ़ैज़-ए-क़ल्ब-ए-मुतमइन नज़र नज़र ग़यूर है
अर्श मलसियानी
नज़्म
आग़ोश-ए-एहतियात में रख लूँ जिगर कहीं
डरता हूँ ले उड़े न किसी की नज़र कहीं
राज्य बहादुर सकसेना औज
नज़्म
यही वो मंज़िल-ए-मक़्सूद है कि जिस के लिए
बड़े ही अज़्म से अपने सफ़र पे निकले थे