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नज़्म
''म'अज़ूर हूँ जो पाँव मिरा बे-तरह पड़े''
''तुम सरगिराँ तो मुझ से न हो मैं नशे में हूँ''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
एक ख़्वाहिश बे-तरह करती है मुझ को बे-क़रार
काश तुझ को देख सकती आँख हर ज़ी रूह की
बासिर सुल्तान काज़मी
नज़्म
तआ'रुफ़ बे-तआ'रुफ़ हो चुका आओ हँसें बोलें
कि अब ख़ामोशियाँ बढ़ कर क़यामत होती जाती हैं