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नज़्म
मुल्क के अंदर जो अख़बारों के हैं नामा-निगार
जिन को बा-इज़्ज़त नहीं मिलता है कोई रोज़गार
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ख़ुदा उस क़ौम को इज़्ज़त नहीं देता ज़माने में
जिसे क़ौमी बुज़ुर्गों का अदब करना नहीं आता
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
ग़रीबी तंग-दस्ती में क़नाअत है बग़ावत है
न दौलत है न राहत है न इज़्ज़त है बग़ावत है
बशीरुद्दीन राज़
नज़्म
वादी-ए-कश्मीर है या चश्मा-ए-क़ुदरत है ये
गोशे गोशे में जो बिखरी बे-बहा दौलत है ये