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नज़्म
कम है जितना भी करें जम्हूरियत पर नाज़ हम
गाँधी नेहरू ने वो खोला बाब-ए-ऐवान-ए-वतन
साबित ख़ैराबादी
नज़्म
मिटा देता है दम में नख़वत-ए-नमरूद इक मच्छर
कभी ऐसा भी दौर-ए-गर्दिश-ए-अय्याम आता है
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
मिटा देता है दम में नख़वत-ए-नमरूद इक मच्छर
कभी ऐसा भी दौर-ए-गर्दिश-ए-अय्याम आता है
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
ग़ैरत-ए-बाग़-ए-इरम हैं खेतियाँ हर गाँव में
ख़ुल्द का आराम है पेड़ों की ठंडी छाँव में
अर्श मलसियानी
नज़्म
किसी बाब-ए-आतिश-ज़दा पर खड़ा मुस्कुराने लगा है
कहीं हिज्र की साअतें गिनते गिनते मुझे नींद आई हुई है
अहमद ज़फ़र
नज़्म
क़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़ थीं माहौल की ख़ामोशियाँ
दफ़अतन काफ़िर पपीहा बोल उठा अब क्या करूँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
क़फ़स का दर बना देते हैं रश्क-ए-बाब-ए-आज़ादी
जो अहल-ए-होश हैं 'तकमील' ज़िंदानों में रहते हैं