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नज़्म
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
आसमाँ करता है शब-भर गौहर-ए-अंजुम निसार
फूल करती है निछावर हर सहर बाद-ए-बहार
सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
नज़्म
भड़के इक आह कहा चाँद ने यूँ ज़ोहरा से
ऐ निगार-ए-रुख़-ए-ज़ेबा-ए-बहार-ए-अफ़्लाक