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नज़्म
चाँद क्यों रात के पहलू में बुरा लगता है
सुब्ह के साथ पे इतराती हुई बाद-ए-नसीम
ज़हीर मुश्ताक़ राना
नज़्म
है लुत्फ़-ओ-ऐश ज़ीस्त कि जब तक शबाब है
फिर इस के बाद ज़ीस्त समझ लो अज़ाब है
नसीम फ़ातिमा नज़र लखनवी
नज़्म
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ऐ सुबुक-पर्वाज़! तेरी सुरअ'त-ए-पर्वाज़ ने
तय किए कितने ही दिन भर सर्व-तबक़ात-ए-नसीम
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
ऐ मुक़द्दस हूर ऐ पर्वर्दा-ए-मौज-ए-नसीम
रूह-ए-इशरत-गाह-ए-साहिल जान-ए-तूफ़ान-ए-अज़ीम