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नज़्म
ज़ेहन पर बार-ए-गिराँ बंद क़बा के लम्स का एहसास भी
और शहर-ए-हब्स में रस्ता कोई खुलता नहीं
सईद अहमद
नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़्गन-ए-इल्म
किस के सर जाएगा अब बार-ए-गिरान-ए-उर्दू
मसऊद हुसैन ख़ां
नज़्म
हिन्द के बाँके सिपाही अज़्म के कोह-ए-गिराँ
ज़िंदाबाद ऐ फ़ख़्र-ए-मशरिक़ नाज़िश-ए-हिन्दोस्ताँ
तकमील रिज़वी लखनवी
नज़्म
संग को गौहर-ए-नायाब-ओ-गिराँ जाना था
दश्त-ए-पुर-ख़ार को फ़िरदौस-ए-जवाँ जाना था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो जिन्हें ताब-ए-गिराँ-बारी-ए-अय्याम नहीं
उन की पलकों पे शब ओ रोज़ को हल्का कर दे