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नज़्म
उसे इक खोटे सिक्के की तरह सब को दिखाना है
कभी जब सोचता हूँ अपने बारे में तो कहता हूँ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
न बात अब तक सुनी गई है
शराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या है
तारिक़ क़मर
नज़्म
बाद-ए-बहारी बन के चलेंगे सरसों बन कर फूलेंगे
ख़ुशियों के रंगीं झुरमुट में रंज-ओ-मेहन सब भूलेंगे
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तिरे होंटों से निकले साँस की ख़ुश्बू
दर-ओ-दीवार से रस्ता बना कर सारे बर्र-ए-'आज़मों में फैल सकती है
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
कभी अपने बारे में इतनी ख़बर ही न रक्खी थी
वर्ना बिछड़ने की ये रस्म कब की अदा हो चुकी होती
परवीन शाकिर
नज़्म
यादों के बारे में और उदासी के बारे में और तन्हाई के बारे में
कोई बात यक़ीन से नहीं कही जा सकती
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ा लगा माथे उपर बारे
'नज़ीर' आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे