aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bache"
कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुएएक बिफरी हुई लहर को राम करते हुएना-ख़ुदाओं में अब पीछे कितने बचे हैंरौशनी और अँधेरे की तफ़रीक़ में कितने लोगों ने आँखें गँवा दींकितनी सदियाँ सफ़र में गुज़ारींमगर आज फिर उस जगह हैं जहाँ से हमें अपनी माओं नेरुख़्सत किया थाअपने सब से बड़े ख़्वाब को अपनी आँखों के आगे उजड़ते हुएदेखने से बुरा कुछ नहीं हैतेरी क़ुर्बत में या तुझ से दूरी पे जितनी गुज़ारीतेरी चूड़ियों की क़सम ज़िंदगी दाएरों के सिवा कुछ नहीं हैकुहनियों से हमें अपना मुँह ढाँप कर खाँसने को बड़ों ने कहा थातो हम उन पे हँसते थे और सोचते थे कि उन को टिशू-पेपरों की महक से एलर्जी हैलेकिन हमें ये पता ही नहीं था कि उन पे वो आफ़ात टूटी हैंजिन का हमें इक सदी बा'द फिर सामना हैवबा के दिनों में किसे होश रहता हैकिस हाथ को छोड़ना है किसे थामना हैइक रियाज़ी के उस्ताद ने अपने हाथों में परकार ले करये दुनिया नहीं दायरा खींचना थाख़ैर जो भी हुआ तुम भी पुरखों के नक़्श-ए-क़दम पर चलोऔर अपनी हिफ़ाज़त करोकुछ महीने तुम्हें अपने तस्मे नहीं बाँधनेइस से आगे तो तुम पे है तुम अपनी मंज़िल पे पहुँचो या फिर रास्तों में रहोइस से पहले कि तुम अपने महबूब को वेंटीलेटर पे देखोघरों में रहो
हमला जब क़ौम-ए-आर्या ने कियाऔर बजा उन का हिन्द में डंकामुल्क वाले बहुत से काम आएजो बचे वो ग़ुलाम कहलाएशुद्र कहलाए राक्षस कहलाएरंज परदेस के मगर न उठाएगो ग़ुलामी का लग गया धब्बान छुटा उन से देस पर न छुटा
मगर रुको ज़रा ठहरो ये सिसकियाँ कैसीख़ुशी कि रुत में दुखों की ये बदलियाँ कैसीसुनो ये ग़ौर से माएँ बिलक रही हैं कहींये देखो बच्चों की आँखें छलक रही हैं कहींकिसी के ईद के जोड़े में है कफ़न आयाकहीं पे ज़ख़्मों से लिपटा हुआ बदन आयाकोई तो खिलने से पहले कली को लूट गयाकहीं दरख़्त ही अपनी ज़मीं से टूट गयाकिस ने कर दिए पामाल साया-दार शजरजड़ें कहीं पे कटीं और कहीं बचे न समर
आठ ही बिलियन उम्र ज़मीं की होगी शायदऐसा ही अंदाज़ा है कुछ साइंस काचार एशारिया बिलियन सालों की उम्र तो बीत चुकी हैकितनी देर लगा दी तुम ने आने मेंऔर अब मिल करकिस दुनिया की दुनिया-दारी सोच रही होकिस मज़हब और ज़ात और पात की फ़िक्र लगी हैआओ चलें अबतीन ही बिलियन साल बचे हैं
चाँद भी कम्बल ओढ़े निकला थासितारे ठिठुर रहें थेसर्दी बढ़ रही थीठण्ड से बचने के लिएमुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े
मैं उस सिगरेट का टुकड़ा हूँजिसे तुम ने पिया था अपनी ख़ुशी के लिएऔर अब अपने जूते सेमसल देना चाहते होताकि उस की चिंगारी आग न लगा देतुम्हारे लकड़ी-नुमा वजूद कोमहफ़ूज़ रहने की तुम्हारी ख़्वाहिशतुम्हारे जज़्बात को सुन कर देती हैकिसी दूसरे की तड़पतुम पर कोई असर नहीं करतीसिगरेट के बचे टुकड़े कोआसानी से फेंक सकते होमगर इस धुएँ का क्या करोगेजो तुम्हारे दिल में भर गया है
पड़ जाए इस जहान में तेरी अगर कमीचौपाया कोई ज़िंदा बचे और न आदमी
अब बैंड पे गाया जाएगाये साज़ न छेड़े जाएँगेले रख दे ठिकाने से ये ग़ज़लमरने से बचे तो गाएँगेहै साथ हमारे सच्चाईहम पा के विजय मुस्काएँगेजीती हुई बाज़ी मात न करइस वक़्त ग़ज़ल की बात न कर
सफ़ीर-ए-लैला ये क्या हुआ हैशबों के चेहरे बिगड़ गए हैंदिलों के धागे उखड़ गए हैंशफ़ीक़ आँसू नहीं बचे हैं ग़मों के लहजे बदल गए हैंतुम्ही बताओ कि इस खंडर में जहाँ पे मकड़ी की सनअतें होंजहाँ समुंदर हों तीरगी केसियाह-जालों के बादबाँ होंजहाँ पयम्बर ख़मोश लेटे हों बातें करती हों मुर्दा रूहेंसफ़ीर-ए-लैला तुम्ही बताओ जहाँ अकेला हो दास्ताँ-गोवो दास्ताँ-गो जिसे कहानी के सब ज़मानों पे दस्तरस होशब-ए-रिफ़ाक़त में तूल-ए-क़िस्सा चराग़ जलने तलक सुनाएजिसे ज़बान-ए-हुनर का सौदा हो ज़िंदगी को सवाल समझेवही अकेला हो और ख़मोशी हज़ार सदियों की साँस रोकेवो चुप लगी हो कि मौत बाम-ए-फ़लक पे बैठी ज़मीं के साए से काँपती होसफ़ीर-ए-लैला तुम्ही बताओ वो ऐसे दोज़ख़ से कैसे निपटेदयार-ए-लैला से आए नामे की नौ इबारत को कैसे पढ़ लेपुराने लफ़्ज़ों के इस्तिआरों में गुम मोहब्बत को क्यूँके समझेसफ़ीर-ए-लैला अभी मलामत का वक़्त आएगा देख लेनाअगर मुसिर हो तो आओ देखोयहाँ पे बैठो ये नामे रख दोयहीं पे रख दो इन्ही सिलों परकि इस जगह पर हमारी क़ुर्बत के दिन मिले थेवो दिन यहीं पर जुदा हुए थे इन्ही सिलों परऔर अब ज़रा तुम नज़र उठाओ मुझे बताओ तुम्हारा नाक़ा कहाँ गया हैबुलंद टख़नों से ज़र्द रेती पे चलने वाला सबीह नाक़ावो सुर्ख़ नाक़ा सवार हो कर तुम आए जिस पर बुरी सरा मेंवही कि जिस की महार बाँधी थी तुम ने बोसीदा उस्तुख़्वाँ सेवो अस्प-ए-ताज़ी के उस्तुख़्वाँ थेमुझे बताओ सफ़ीर-ए-लैला किधर गया वोउधर तो देखो वो हड्डियों का हुजूम देखोवही तुम्हारा अज़ीज़ साथी सफ़र का मोनिसप अब नहीं हैऔर अब उठाओ सिलों से नामेपढ़ो इबारत जो पढ़ सको तोक्या डर गए हो कि सतह-ए-काग़ज़ पे जुज़ सियाही के कुछ नहीं हैख़जिल हो इस पर कि क्यूँ इबारत ग़ुबार हो कर नज़र से भागीसफ़ीर-ए-लैला ये सब करिश्मे इसी खंडर ने मिरी जबीं पर लिखे हुए हैंयही अजाइब हैं जिन के सदक़े यहाँ परिंदे न देख पाओगेऔर सदियों तलक न उतरेगी याँ सवारीन चोब-ए-ख़ेमा गड़ेगी याँ परसफ़ीर-ए-लैला ये मेरे दिन हैंसफ़ीर-ए-लैला ये मेरी रातेंऔर अब बताओ कि इस अज़िय्यत में किस मोहब्बत के ख़्वाब देखूँमैं किन ख़ुदाओं से नूर माँगूँमगर ये सब कुछ पुराने क़िस्से पराई बस्ती के मुर्दा क़ज़िएतुम्हें फ़सानों से क्या लगाओतुम्हें तो मतलब है अपने नाक़ा से और नामे की उस इबारत सेसतह-ए-काग़ज़ से जो उड़ी हैसफ़ीर-ए-लैला तुम्हारा नाक़ामैं उस के मरने पर ग़म-ज़दा हूँतुम्हारे रंज ओ अलम से वाक़िफ़ बड़े ख़सारों को देखता हूँसो आओ उस की तलाफ़ी कर दूँ ये मेरे शाने हैं बैठ जाओतुम्हें ख़राबे की कारगह से निकाल आऊँदयार-ए-लैला को जाने वाली हबीब राहों पे छोड़ आऊँ
ये दुनिया तो उन शोला सामान लोगों ने आपस में तक़्सीम कर लीजो हथियार की शक्ल में रंज-ओ-ग़म ढालते हैंया गोला-बारूद के कार-ख़ानों के मालिक हैंया फिर सना-ख़्वाँ हैं उन केहमारे लिए सिर्फ़ नारे बचे हैंसनअती दौर के कज-कुलाहों की दाद-ओ-दहिश रूह-परवर हो या जान-लेवामगर ज़िंदाबाद, आफ़रीं, मर्हबा, के सिवा कुछ नहीं पास अपनेये सब जानता है हमारी शुजाअत की परवाज़ क्या हैहमारी जवाँ-मर्दी इक सूबा-जाती तअस्सुब सेया फ़िरक़ा-वारी फ़सादात से आगे कुछ भी नहीं हैफ़ुतूहात-ए-अस्कन्दरी हम ने तख़्ती पे लिख कर मिटा दी हैं कब कीहमारे बाद ज़मीं के तले सो रहे हैंअजाइब-घरों में लटकती हैं तलवारें उन कीऔर उन के ज़र्रीं लिबादों को घुन खा गया हैज़िरा-बक्तरों पर क्लोन्स आ गई हैये सब जानता है हमारी तग-ओ-ताज़ क्या हैहमारे शिकम गर हमारे सुरों पे न होतेऔर चेहरों में आज़ा-ए-जिंसीतो हम अच्छे इंसान बनतेहमारे घरों के कम ओ बेश सब अक़बी दरवाज़े पैहम खुले हैंहमारे लहू में हरे लाल पीले बहुत सारे परचम खुले हैंकहीं से मगर हक़ की आवाज़ आती नहीं हैहमारी ज़बाँ दिल की साथी नहीं हैहमारे लिए खोखला लफ़्ज़-ए-जम्हूरियत है, तक़ारीर हैं लीडरों कीहमारे लिए रोज़-नामों के सफ़्हात हैं, इश्तिहारात हैं नीम-जिंसीहमारे लिए देवताओं के बुत हैं, ख़ुदा के फ़रामीन हैं और उक़्बाजो बद-रंग है हाल की तरह और कोरे लट्ठे की बू से भरी हैहमारे लिए सिर्फ़ रोटी की जिद्द-ओ-जोहदऔरतों के बरहना बदन की तमन्ना से आगे कहीं कुछ नहीं हैहमारी रगों में जो तेज़ाब है उस की शिद्दत कभी कम न होगी!
अरे आओबे-फ़िक्र हो के आओमेरी ज़िंदगी मेंघबराओ नहींकोई टूट-फूट नहीं होगी तुम सेआओ तोदर-अस्ल यहाँ कुछ बाक़ी ही नहीं टूटने कोहाँ कुछ पुराने ख़्वाबों की किर्चें हैंतुम्हारे आने तक साफ़ हो जाएँगीउस के बा'द जो होगा सब तुम्हारा ही होगाजाते वक़्त जो कुछ सलामत बचेले जानाख़्वाबों की किर्चें गर रह गईं तुम्हारे बा'द तो समेट के रख देना मेरे होंठों पेमुस्कुराहटों में बाँध के
आएँगे इक दिन परदेस वालेऐ गाँव थोड़े आँसू बचा ले
मैं तकमील के सहरा में भटकता हुआ ज़र्रा हूँसूरज होने के गुमान से दूरऔर बचे हुए लम्हों को गोद में लिए ज़िंदगीहर राएगाँ सुब्ह की चिता परसती हो जाने वाली बेवा है
एक थे पेटू साहब जिन की छे फ़ुट थी ऊँचाईबैठे बैठे पहलू बदलें दस रोटी खा जाएँइक दिन पेटू साहब को इस घर से दावत आईदिन छुपने से पहले पेटू उस घर पर जा धमकेदस्तर-ख़्वान लगा तो बैठे कुछ तन के कुछ जम केपहले रोटी सालन सारे घर-भर का खा डालाफिर घर की बाक़ी चीज़ों का निकला ख़ूब दीवालाबारह लड्डू बीस इमिर्ति सोला बालू-शाहीचौदह केले दर्जन चीकू हलवा एक कड़ाहीघबरा कर घर के मालिक ने नौकर को दौड़ायाएक किलो बाज़ार से हलवा गाजर का मंगवायाहलवा खा कर बोले पेटू दे मोंछों पर तावयार ज़रा अंदर से थोड़ा सा नमकीन मंगाओथोड़ी दाल बची थी पी ली फिर लोटा भर पानीघर की हालत जान चुके थे सो उठने की ठानीसाहब-ए-ख़ाना बोले बैठो बैठो कुछ फ़रमाओघर में जूते और बचे हैं वो भी खाते जाओ
ख़ू-ए-आज़ाद जिस ने पाई हैउस के क़ब्ज़े में कुल ख़ुदाई हैउन से मैं भी ये बात कहता हूँजिन की तक़दीर में बुराई हैअपने माज़ी पे डाल लो नज़रेंकिस क़दर किस ने की भलाई हैबात आई ज़बाँ पे कहता हूँये तो बंदों ही की ख़ुदाई हैरोक कर गला कर रहे हैं ब्लैकक़हत की हर तरफ़ दहाई हैकितने ठेके में अब की बार बचेकितनी रिश्वत की दौलत आई हैअपने अपनों को पूछता है हर इकअहल-ए-ताक़त ही की बन आई हैगर मिनिस्टर है आप का सालातो कलेक्टर बना जमाई हैहै जो इंजीनियर सिफ़ारिश सेफिर तो ठेके में इस का भाई हैख़ौफ़ है किस का राज है अपनाअपना ही सारा आना-पाई हैरोज़ी और रोज़गार हैं उन केहम ग़रीबों का हक़ गदाई हैइन का ज़रीया है ये कमाने कादेखने ही की पारसाई हैकिस से जा कर 'कँवल' करे फ़रियादहाए बापू तिरी दुहाई हैआज फिर से अगस्त आया हैसब के घर में ख़ुशी ही छाई हैसाल-ए-आइंदा के कमाने कोतुम ने स्कीम क्या बनाई है
इस बात से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ताकि मरने वाला ज़िंदगी से नबर्द-आज़मा किसी शाएरा या शाएर का बेटा थाया राज-पूत नस्ल का कोई ज़िंदा-दिल माज़ूल शहज़ादाया मरने वाले जवान बेटे का नाम कबीर, तारिक़ अहद या कुछ और थाजवान बेटे की मौतइंसान को पानी में हलाक करने पर मामूर फ़रिश्ते ने लीया ख़ुश्की पर इंसानी रूह क़ब्ज़ करने के मजाज़ फ़रिश्ते नेऐसी या ऐसी किसी भी बात सेकोई फ़र्क़ नहीं पड़ताक्यूँकि मौत का फ़रिश्ता तीनों मक़ामात परजवान बेटे को माँ बाप से जुदा करने में नाकाम रहामौत का फ़रिश्ता लगा रहता है दिन रातअपनी नाकामी का इंतिक़ाम लेने मेंटुकड़े टुकड़े करता रहता हैमाँ बाप का दिलजैसे काटा जाता है मशीन के तेज़ धार बलेड सेमवेशियों का चाराकोड़े मारता रहता है माँ बाप की ज़ख़्मी रूह को बरहना कर केईजाद करता रहता है नित-नए तरीक़ेमाँ बाप के बचे-खुचे दिल को अज़िय्यत पहुँचाने केमौत का फ़रिश्ता दाख़िल हो जाता है बग़ैर इजाज़तकिसी शाएर के बेड-रूम में रात ख़राब करनेमजबूर कर देता है शाएर कोज़ख़्मों से कराहती नज़्म लिखने पर
जंगल कटते जाते हैंशेर बहुत घबराते हैंपूँछ उठाए फिरते हैंहर आहट पे डरते हैंक्या जाने कब पेड़ कटेक्या जाने कब शाख़ गिरेचिड़ियाँ उड़ कर चली गईंबच्चे छूटे यहीं कहींहाथी को ये फ़िक्र हुईचुरा न ले तालाब कोईतब वो कहाँ नहाएगाकैसे प्यास बुझाएगाभालू भी ख़ामोश हुआगीदड़ को अफ़्सोस हुआजब देखो तब आदम-ज़ादजंगल काट के हो गया शादहर दम हाथ में आरी हैये कैसी बीमारी हैपेड़ अगर कट जाएँगेछाँव कहाँ से पाएँगेघिर घिर बादल आएँगेबिन बरसे उड़ जाएँगेमिट्टी ढीली हुई अगरनदी चलेगी इधर उधरघर के घर ढह जाएँगेहम कैसे रह पाएँगेपेड़ कटे और पेड़ लगेतब जा के संसार बचे
मुनाफ़िक़ों की भीड़ हैबचे रहो सवाल सेसवाल के जवाब से बचे रहोबचे रहो कि बोलने के कर्ब तुम को नईं पतासवाल गर करोगे तो ज़बाँ-दराज़ और बद-ज़बान कह के ये पुकारेंगेजवाब गर दिया इन्हें तो बद-तमीज़ और बे-लिहाज़ ये बताएँगेतुम्हारे वास्ते कोई भी रास्ता कहीं नहींगर एक सम्त से दबाव तेज़ आंधियों का हैतो दूसरी तरफ़ से शोर आग की लवों का हैतुम्हारे इक तरफ़ दिमाग़ी भेड़िये हज़ार हैंतो दूसरी तरफ़ शिकारियों के काँटे-दार तार हैंतुम्हारे वास्ते कोई भी रास्ता कहीं नहींये आँधियाँ ये आग भेड़िये शिकारी कौन हैंये सब तुम्हारे लोग हैंमैं इक ज़बाँ-दराज़ बद-ज़बान बद-तमीज़ बे-लिहाज़ बस ये चाहता हूँतुम बचे रहोइन आंधियों के आग के भेड़िये शिकारियों के हर सवाल सेसवाल के जवाब सेये जो तुम्हारे आस-पास लोग हैंमुनाफ़िक़ों की भीड़ है
दिल-ए-मायूस में है तेरी यादजैसे वीराना में हो गंज-ए-निहाँजैसे मायूसियों की ज़ुल्मत मेंइक शुआ-ए-उमीद हो लर्ज़ांजैसे ख़ामोशियों में सहरा कीहो सदा-ए-ख़िराम-ए-जू-ए-रवाँजैसे आरिफ़ के दिल में नूर-ए-ख़ुदाजैसे आशिक़ के सीने में अरमाँजैसे बीमार को नवेद-ए-मसीहजैसे हातिम को मुज़्दा-ए-मेहमाँजैसे नाज़ुक सी एक कश्ती होदरमियान-ए-कशाकश-ए-तूफ़ाँजैसे टूटे हुए खंडर में होंबाक़ी पिछली इमारतों के निशाँहों चमन में बचे हुए जैसेमौसम-ए-गुल के कुछ गुल ओ रैहाँजैसे चिंगारी ज़ेर-ए-ख़ाकिस्तरजैसे इक शो'ला-ए-तह-ए-दामाँहै तिरी याद ज़िंदगी मेरीइस को दे कर न लूँ मैं बाग़-ए-जिनाँकभी ज़ाहिर है दिल की धड़कन सेकभी ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ में है पिन्हाँदर्द बन कर कभी है दिल में मुक़ीमकभी आँखों से अश्क बन के रवाँहों ग़रज़ तेरी याद से ऐ दोस्तहश्र-बर्दोश ख़ुल्द दर-दामाँ
आँधी थी तूफ़ान था क्या थामेरी मेज़ पे कौन आया थाकैमल इंक पड़ी है उल्टीगुल-दानों में रेत भरी हैकुर्सी की टाँगें तिरछी हैंफ़ाइल में तितली नत्थी हैटाइमपीस का शीशा टूटामेज़-पोश पर काले धब्बेकटे हुए अख़बार के फोटोलेटर-पैड में काग़ज़ आधेटोपी ग़ाएब है शेफर कीकम हैं एल्बम के नौ पन्ने'अदनान' और 'ज़मन' कहते हैंऐमन टॉफ़ी ढूँड रहे थे'हमरा' 'समरा' नाच रही थीं'फ़ैज़ी' मार रहे थे छक्केमेज़ पर हल्ला बोलने वालेथे मेरे ही प्यारे बचे
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