aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bachte"
हया में डूबने वाले भी आज उभरते हैंहसीन शोख़ियाँ करते हुए गुज़रते हैंजो चोट से कभी बचते थे चोट करते हैंहिरन भी खेल रहे हैं शिकार होली में
तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिएवक़्त की बे-उनवान कहानी कब तक बे-उनवान रहेऐ मिरे सोच-नगर की रानी ऐ मिरे ख़ुल्द-ए-ख़याल की हूरइतने दिनों जो मैं घुलता रहा हूँ तेरे बिना यूँही दूर ही दूरसोच तो क्या फल मुझ को मिला मैं मन से गया फिर तन से गयाशहर-ए-वतन में अजनबी ठहरा आख़िर शहर-ए-वतन से गयारूह की प्यास बुझानी थी पर यहाँ होंटों की प्यास भी बुझ न सकीबचते सँभलते भी एक सुलगता रोग बनी मिरे जी की लगीदूर की बात न सोच अभी मिरे हात में तू ज़रा हात तो देतुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिएबाग़ में है इक बेले का तख़्ता भीनी है इस बेले की सुगंधऐ कलियो क्यूँ इतने दिनों तुम रक्खे रहीं इसे गोद में बंदकितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिएतुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सकेसेहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगेफिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगेऐ मिरे सोच-नगर की रानी वक़्त की बातें रंग और बूहर कोई साथ किसी का ढूँडे गुल हों कि बेले मैं हूँ कि तूजो कुछ कहना है अभी कह ले जो कुछ सुनना है सुन लेतुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए
ऐ मजाज़ ऐ तराना-बार मजाज़ज़िंदा पैग़म्बर-ए-बहार मजाज़ऐ बरू-ए-समन-विशाँ गुल-पोशऐ ब कू-ए-मुग़ाँ तमाम ख़रोशऐ परस्तार-ए-मह-रुख़ान-ए-जहाँऐ कमाँ-दार-ए-शाइरान-ए-जवाँतुझ से ताबाँ जबीन-ए-मुस्तक़बिलऐ मिरे सीना-ए-उमीद के दिलऐ मजाज़ ऐ मुबस्सिर-ए-ख़द-ओ-ख़ालऐ शुऊर-ए-जमाल ओ शम-ए-ख़यालऐ सुरय्या-फ़रेब ओ ज़ोहरा-नवाज़शाइर-ए-मस्त ओ रिंद-ए-शाहिद-बाज़नाक़िद-ए-इश्वा-ए-शबाब है तूसुब्ह-ए-फ़र्दा का आफ़्ताब है तूतुझ को आया हूँ आज समझानेहैफ़ है तू अगर बुरा मानेख़ुद को ग़र्क़-ए-शराब-ए-नाब न करदेख अपने को यूँ ख़राब न करशाइरी को तिरी ज़रूरत हैदौर-ए-फ़र्दा की तू अमानत हैसिर्फ़ तेरी भलाई को ऐ जाँबन के आया हूँ नासेह-ए-नादाँएक ठहराव इक तकान है तूदेख किस दर्जा धान-पान है तूनंग है महज़ उस्तुख़्वाँ होनासख़्त इहानत है ना-तवाँ होनाउस्तुख़्वानी बदन दुख़ानी पोस्तएक संगीन जुर्म है ऐ दोस्तशर्म की बात है वजूद-ए-सक़ीमना-तवानी है इक गुनाह-ए-अज़ीमजिस्म और इल्म तुर्फ़ा ताक़त हैयही इंसान की नबुव्वत हैजो ज़ईफ़-ओ-अलील होता हैइश्क़ में भी ज़लील होता हैहर हुनर को जो एक दौलत हैइल्म और जिस्म की ज़रूरत हैकसरत-ए-बादा रंग लाती हैआदमी को लहू रुलाती हैख़ुश-दिलों को रुला के हँसती हैशम-ए-अख़्तर बुझा के हँसती हैऔर जब आफ़त जिगर पे लाती हैरिंद को मौलवी बनाती हैमय से होता है मक़्सद-ए-दिल फ़ौतमय है बुनियाद-ए-मौलविय्यत-ओ-मौतकान में सुन ये बात है नश्तरमौलविय्यत है मौत से बद-तरइस से होता है कार-ए-उम्र तमामइस से होता है अक़्ल को सरसामइस में इंसाँ की जान जाती हैइस में शाइर की आन जाती हैये ज़मीन आसमान क्या शय हैआन जाए तो जान क्या शय हैगौहर-ए-शाह-वार चुन प्यारेमुझ से इक गुर की बात सुन प्यारेग़म तो बनता है चार दिन में नशातशादमानी से रह बहुत मोहतातग़म के मारे तो जी रहे हैं हज़ारनहीं बचते हैं ऐश के बीमारआन में दिल के पार होती हैपंखुड़ी में वो धार होती हैजू-ए-इशरत में ग़म के धारे हैंयख़-ओ-शबनम में भी शरारे हैंहाँ सँभल कर लताफ़तों को बरतटूट जाए कहीं न कोई परतदेख कर शीशा-ए-नशात उठाये वरक़ है वरक़ है सोने काकाग़ज़-ए-बाद ये नगीना हैबल्कि ऐ दोस्त आबगीना हैसाग़र-ए-शबनम-ए-ख़ुश-आब है येआबगीना नहीं हबाब है येरोक ले साँस जो क़रीब आएठेस उस को कहीं न लग जाएतेग़-ए-मस्ती को एहतियात से छूवर्ना टपकेगा उँगलियों से लहूमस्तियों में है ताब-ए-जल्वा-ए-माहऔर सियह मस्तियाँ ख़ुदा की पनाहख़ूब है एक हद पे क़ाएम नशाहल्का फुल्का सुबुक मुलाएम नशाहाँ अदब से उठा अदब से जामताकि आब-ए-हलाल हो न हरामजाम पर जाम जो चढ़ाते हैंऊँट की तरह बिलबिलाते हैंज़िंदगी की हवस में मरते हैंमय को रुस्वा-ए-दहर करते हैंयाद है जब 'जिगर' चढ़ाते थेक्या अलिफ़ हो के हिन-हिनाते थेमेरी गर्दन में भर के चंद आहेंपाँव से डालते थे वो बाँहेंअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीउफ़ घटा-टोप नश्शे का तूफ़ानभूत इफ़रीत देव जिन शैतानलात घूँसा छड़ी छुरी चाक़ूलिब-लिबाहट लुआब कफ़ बदबूतंज़ आवाज़ा बरहमी इफ़्सादता'न तशनीअ' मज़हका ईरादशोर हू-हक़ अबे-तबे है हैऔखियाँ गालियाँ धमाके क़यमस-मसाहट ग़शी तपिश चक्करसोज़ सैलाब सनसनी सरसरचल-चख़े चीख़ चुनाँ-चुनीं चिंघाड़चख़-चख़े चाऊँ चाऊँ चील-चिलहाड़लप्पा-डुक्की लताम लाम लड़ाईहौल हैजान हाँक हाथा-पाईखलबली कावँ कावँ खट-मंडलहौंक हंगामा हमहमा हलचलउलझन आवारगी उधम ऐंठनभौंक भौं भौं भिऩन भिऩन भन-भनधौल-धप्पा धकड़-पकड़ धुत्कारतहलका तू तड़ाक़ तुफ़ तकरारबू भभक भय बिकस बरर भौंचालदबदबे दंदनाहटें धम्मालगाह नर्मी ओ लुत्फ़ ओ मेहर ओ सलामगाह तल्ख़ी ओ तुरशी ओ दुश्नामअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीसिर्फ़ नश्शे की भीगने दे मसेंइन को बनने न दे कभी मूँछेंअल-अमाँ ख़ौफ़नाक काला नशाओह रीश-ओ-बुरूत वाला नशाअज़दर-ए-मर्ग ओ देव-ए-ख़ूँ-ख़्वारीअल-अमाँ नश्शा-ए-''जटाधारी''नश्शे का झुट-पुटा है नूर-ए-हयातझुटपुटे को बना न काली रातनश्शे की तेज़ रौशनी भी ग़लतचौदहवीं की सी चाँदनी भी ग़लतज़ेहन-ए-इंसाँ को बख़्शता है जमालनश्शा हो जब ये क़द्र-ए-नूर-ए-हिलालग़ुर्फ़ा-ए-अक़्ल भेड़ तो अक्सरपर उसे कच-कचा के बंद न कररात को लुत्फ़-ए-जाम है प्यारेदिन का पीना हराम है प्यारेदिन है इफ़रीत-ए-आज़ की खनकाररात पाज़ेब नाज़ुकी झंकारदिन है ख़ाशाक ख़ाक धूल धुआँरात आईना अंजुमन अफ़्शाँदिन मुसल्लह दवाँ कमर बस्तारात ताक़-ओ-रवाक़-ओ-गुल-दस्तादिन है फ़ौलाद-ए-संग तेग़-ए-अलमरात कम-ख़्वाब पंखुड़ी शबनमदिन है शेवन दुहाइयाँ दुखड़ेरात मस्त अँखड़ियाँ जवाँ मुखड़ेदिन कड़ी धूप की बद-आहंगीरात पिछले पहर की सारंगीदिन बहादुर का बान बीर की रथरात चंपाकली अँगूठी नथदिन है तूफ़ान-ए-जुम्बिश-ओ-रफ़्ताररात मीज़ान-ए-काकुल-ओ-रुख़्सारआफ़्ताब-ओ-शराब हैं बैरीबोतलें दिन को हैं पछल पैरीकर न पामाल हुर्मत-ए-औक़ातरात को दिन बना न दिन को रातपी मगर सिर्फ़ शाम के हंगामऔर वो भी ब-क़द्र-ए-यक-दो जामवही इंसाँ है ख़ुर्रम-ओ-ख़ुरसंदजो है मिक़दार ओ वक़्त का पाबंदमेरे पीने ही पर न जा मिरी जाँमुझ से जीना भी सीख हैं क़ुर्बांउस के पीने में रंग आता हैजिस को जीने का ढंग आता हैये नसाएह बहुत हैं बेश-बहाजल्द सो जल्द जाग जल्द नहाबाग़ में जा तुलूअ' से पहलेता निगार-ए-सहर से दिल बहलेसर्व-ओ-शमशाद को गले से लगाहर चमन-ज़ाद को गले से लगामुँह अँधेरे फ़ज़ा-ए-गुलशन देखसाहिल ओ सब्ज़ा-ज़ार ओ सौसन देखगाह आवारा अब्र-पारे देखइन की रफ़्तार में सितारे देखजैसे कोहरे में ताब-रु-ए-निकूजैसे जंगल में रात को जुगनूगुल का मुँह चूम इक तरन्नुम सेनहर को गुदगुदा तबस्सुम सेजिस्म को कर अरक़ से नम-आलूदताकि शबनम पढ़े लहक के दरूदफेंक संजीदगी का सर से बारनाच उछल दंदना छलांगें मारदेख आब-ए-रवाँ का आईनादौड़ साहिल पे तान कर सीनामस्त चिड़ियों का चहचहाना सुनमौज-ए-नौ-मश्क़ का तराना सुनबोस्ताँ में सबा का चलना देखसब्ज़ा ओ सर्व का मचलना देखशबनम-आलूद कर सुख़न का लिबासचख धुँदलके में बू-ए-गुल की मिठासशाइरी को खिला हवा-ए-सहरइस का नफ़क़ा है तेरी गर्दन पररक़्स की लहर में हो गुम लब-ए-नहरयूँ अदा कर उरूस-ए-शेर का महरजज़्ब कर बोस्ताँ के नक़्श-ओ-निगारज़ेहन में खोल मिस्र का बाज़ारनर्म झोंकों का आब-ए-हैवाँ पीबू-ए-गुल रंग-ए-शबनमिस्ताँ पीगुन-गुना कर नज़र उठा कर पीसुब्ह का शीर दग़दग़ा कर पीताकि मुजरे को आएँ कुल बर्कातदौलत जिस्म ओ इल्म ओ अक़्ल ओ हयातये न ता'ना न ये उलहना हैएक नुक्ता बस और कहना हैग़ैबत-ए-नूर हो कि कसरत-ए-नूरज़ुल्मत-ए-ताम हो कि शो'ला-ए-तूरएक सा है वबाल दोनों कातीरगी है मआ'ल दोनों कादर्खुर-ए-साहब-ए-मआ'ल नहींहर वो शय जिस में ए'तिदाल नहींशादमानी से पी नहीं सकताजिस को हौका हो जी नहीं सकताऐ पिसर ऐ बरादर ऐ हमराज़बन न इस तरह दूर की आवाज़कोई बीमार तन नहीं सकताख़ादिम-ए-ख़ल्क़ बन नहीं सकताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ फ़र्ज़ है तुझ परदौर-ए-माज़ी का क़र्ज़ है तुझ परअस्र-ए-हाज़िर के शाइर-ए-ख़ुद्दारक़र्ज़-दारी की मौत से होश्यारज़ेहन-ए-इंसानियत उभार के जाज़िंदगानी का क़र्ज़ उतार के जातुझ पे हिन्दोस्तान नाज़ करेउम्र तेरी ख़ुदा दराज़ करे
तुम जो मग़रिब की जुगाली से कभी थकते नहींतुम को क्या मालूम है तख़्लीक़ का जौहर कहाँफ़लसफ़ी बनते हो अपने आप से पूछो कभीखो गया है रूह का गौहर कहाँतुम दिल-ओ-जाँ से मशरिक़ की परस्तारी करोक्या बरहमन के सिवा कुछ और होक्या किसी की मश्रिक-ओ-मग़रिब में दिलदारी हुईभूक से बेहाल हैं जो उन की ग़म-ख़्वारी हुईअद्ल की मीज़ान जब टूटी पड़ी हो दरमियाँज़िंदगी सारी की सारी ही रिया-कारी हुईमग़रिब-ओ-मशरिक़ की सारी बहस में तुम ना-उमीदी के सिवा क्या दे सकेना-उमीदी कुफ़्र हैकुफ़्र से बचते भी और कुफ़्र ही करते हो तुमतुम तो माज़ी हाल ओ मुस्तक़बिल के भी क़ाइल नहींदिल कहे कुछ भी मगर तुम इस तरफ़ माइल नहींवो जो मुतलक़ है तुम्हारे वास्ते सारे ज़माने दे गयातुम बताओ तुम ने अब तक क्या कियाना-उमीदी कुफ़्र है कुफ़्र ही करते हो तुमदिल में गर रौशन हो उस दिन की उम्मीदजुस्तुजू तुम को जब अपने आप से मिलवाएगीज़िंदगी करने को प्यारे शश-जिहत खुल जाएगी
और थक हार कर वापसी मेंसरकते हुए एक पत्थर से बचते हुएइस तरफ़ मैं ने देखातो ऐसा लगाये पहाड़ी किसी देव-हैकल फ़रिश्ते का जूता हैतुम कत्थई छाल के तंग मोज़े मेंएक पैर डालेये जूता पहनने की कोशिश में लंगड़ा रहे...दूसरी टाँग शायदकिसी आलमी जंग में उड़ गई है
रात के अँधेरे में कितने पाप पलते हैंकितने साँप पलते हैं चार-सू उछलते हैंछेड़िए तो फुन्कारें छोड़िए तो डसते हैंढीट बन के फिरते हैं साँप किस से डरते हैंलोग डरते फिरते हैं लोग बचते फिरते हैंख़ामुशी के ग़ारों में ख़ामुशी से छुपते हैंएक दूसरे का मुँह बेबसी से तकते हैं
चंद साल उस तरफ़हम शनासा निगाहों से बचते-बचातेयहीं पर मिले थेतुम्हें याद हैकाएनात एक टेबल के चारों तरफ़ घूमती थीहमें देख कर कितने बूढ़ों की आँखेंकिसी याद-ए-रफ़्ता में नम हो रही थीमगर मैं ने आँखों मेंअपने लिए और तुम्हारे लिएमछलियों की तरह तैरते आँसुओं में तमन्नाएँ देखींमुझे याद हैजब किसी अजनबी मेहरबाँ ने हमें फूल भेजेतो तुम कितनी नर्वस हुईंजल्द ही ख़ौफ़, ख़दशे हवा हो गएदूसरी टेबलों पर भी गुल-दस्ते हँसने लगेअब मोहब्बत का मस्कन कहीं और हैये जगह अब ज़बाँ-बंद दुश्मन का मुँह खोलने के लिए हैजहाँ अपनी टेबल थी अब उस जगह एक फंदा लगा हैकहाँ आ गई हो मोहब्बत का कतबा उठाए हुएआओ आगे चलें
इकसठ साल गुज़रते हैंअफ़्ग़ानों की इक बस्ती में लड्डन-ख़ाँ ने जन्म लिया थादारोग़ा के बेटे थे वो नाना उन के मौलाना थेखाता-पीता घर था उन कालड्डन-ख़ाँ अच्छे बच्चे थे बिल्कुल वैसे जैसे तुम होउन के घर वाले भी उन से उतनी ही उल्फ़त करते थे जितनी हम तुम से करते हैंजब वो थोड़े बड़े हुए तोनाना उन को मकतब में दाख़िल कर आएलड्डन-ख़ाँ ने पढ़ना सीखालिखना सीखा लड़ना सीखा आख़िर वो अफ़्ग़ानी भी थेचौदह पंद्रह बरसों ही में लड्डन-ख़ाँ को ये बे-फ़िक्री रास न आईनाना और अब्बू दोनों ने लड्डन-ख़ाँ से कट्टी कर लीमरना जीना तुम क्या समझोतब मजबूरनलड्डन-ख़ाँ ने पढ़ना छोड़ाअपने घर से नाना जोड़ाट्यूशन करते लशटम-पशटम अपने घर का ख़र्च चलातेउन की अम्माँ को राजा से थोड़ी सी पेंशन मिलती थी काम किसी सूरत चल जातामाँ ने उन की शादी कर दीलेकिन बीवी ख़ुश-क़िस्मत थी जिस ने जल्द ही कई कर लीगुड्डू बेटेहोनी हो कर ही रहती हैमकतब में रह कर लड्डन-ख़ाँ ग़ज़लें कहना सीख चुके थेअफ़्ग़ानी होने के नाते लोगों से डरते भी नहीं थेअपनी ग़ज़लों में नज़्मों में तीखी तीखी बातें कहते लोगों पर फबती कसते थेअपने हों या ग़ैर सभी परसच कहने में सच लिखने में बाक न करते ये तो एक नशा होता हैबस फिर क्या था अपने ग़ैर सभी उन के दुश्मन बन बैठेट्यूशन छूटे वी-मेनी की वी-मेनी से मुंशी-गीरीदर दर भटके बाज़ न आएकड़वी तीखी ग़ज़लें नज़्में कह कह कर अम्बार लगायाइतने से भी चल सकता थालेकिन वो तो राजा-जी पर फबती कस कर अम्मी की पेंशन ले डूबेबोलो उन की क्या अटकी थी राजा जो कुछ भी करता था लड्डन-ख़ाँ से क्या मतलब थाअम्मी बेचारी इस ग़म में कुढ़ कुढ़ कर परदेस सिधारीं यूँ समझो बस रूठ गईं वो लड्डन-ख़ाँ सेलेकिन बेटा मरने में पैसे लगते हैं लड्डन-ख़ाँ ने घर भी बेचाआगे पीछे कोई नहीं था अब तो लड्डन-ख़ाँ खुल-खेलेसच्ची सच्ची बातें कह कर कड़वी तीखी ग़ज़लें लिख कर ज़हर-आलूदा नज़्में पढ़ करएक सिरे से सब लोगों को दुश्मन-दर-दुश्मन कर बैठेसारी दुनिया दुश्मन हो तो लड्डन-ख़ाँ बचते भी कैसेसब ने मिल कर घेरा डालाआगे दुश्मन पीछे दुश्मन दाएँ दुश्मन बाएँ दुश्मन ऊपर दुश्मन नीचे दुश्मनलड्डन-ख़ाँ में अक़्ल नहीं थी अब भी चिकनी-चुपड़ी बातें कर के चुपके से बच लेतेलड्डन-ख़ाँ ने अपनी ग़ज़लें अपनी नज़्में सारी चीज़ें छोड़ करचुपके से मर जाने ही को बेहतर जाना
मुद्दत से यही दुनिया कहती चली आई हैबचते रहो हर लम्हाअफ़सर की अगाड़ी से घोड़े की पिछाड़ी सेलेकिन ये नया युग हैइस दौर में बतलाओकैसे कोई बच पाएअफ़सर कभी घोड़ा हैघोड़ा कभी अफ़सर है
शराफ़तों के सर-ओ-पाउतार कर फेंकेंचलेंसड़क पे ज़रा घूमेंफ़िक़रे चुस्त करेंकिसी को बे-वज्ह छेड़ेंहँसी उड़ाएँबुलाएँबुला के प्यार करेंसताएँरास्ते चलते किसी मुसाफ़िर कोग़लत पता देंसड़क के बीच चलेंग़त्ता को पा के इतराएँलगाएँ ठोकरेंफूटबाल मान कर उस कोलगे किसी के जो जा वो तोइधर उधर झांकेंअंजान बनेंसुनें न हॉर्न कोईऔर मरते मरते बचें किबचते बचते हुए मरते उम्र बीत गई
रात के अँधेरे में कितने पाप पलते हैंकितने साँप पलते हैं चार सू उछलते हैंछेड़िए तो फुन्कारें छोड़िए तो डसते हैंढीट बन के फिरते हैं साँप किस से डरते हैंलोग डरते फिरते हैं लोग बचते फिरते हैंख़ामुशी के ग़ारों में ख़ामुशी से छुपते हैंएक दूसरे का मुँह बेबसी से तकते हैं
ऐ क़लम क्या कहूँ मैं सेहर-बयानी तेरीहाल-ए-दिल अपना सुनाता हूँ ज़बानी तेरीतू खिलाता है नए गुल जो रवाँ होता हैरंग ये शाख़-ए-गुल-ए-तर में कहाँ होता हैतेरी आवाज़ है कानों को सरीर-ए-दिलकशसौ तरानों से है बेहतर ये नफ़ीर-ए-दिलकशइक जहाँ पर है तसल्लुत तिरा क़ब्ज़ा तेराहर ज़माने में चला करता है सिक्का तेराज़ौक़ है जिन को समझते हैं वो तौक़ीर तेरीचुटकियाँ दिल में लिया करती है तहरीर तेरीबढ़ के ए'जाज़ से है सेहर-निगारी तेरीनक़्श-ए-दिलकश में तिरे शक्ल है प्यारी तेरीकभी दो लफ़्ज़ों में रोतों को हँसा देता हैहँसने वालों को कभी तू ही रुला देता हैहम ने बचते न सुना एक भी मारा तेराजो है तलवार वो है मानती लोहा तेरातेरी रफ़्तार से दिल वक़्फ़-ए-अलम होते हैंतेरी जुम्बिश से सर अक्सर के क़लम होते हैंभेजता है कभी पैग़ाम-ए-मोहब्बत तू हीदिल-ए-मग़्मूम को है बाइ'स-ए-हुज्जत तू हीदुश्मन-ए-जान-ए-हज़ीं ईसा-ए-दौराँ तू हैसम्म-ए-क़ातिल है कभी चश्मा-ए-हैवाँ तू हैकोई किस तरह कहे आज से कल से तू हैसब को तस्लीम ये है रोज़-ए-अज़ल से तू हैख़त्म ता-हश्र नहीं होगा कभी काम तेरासफ़हा-ए-दहर से मिटने का नहीं नाम तेराजितनी दुनिया में किताबें हैं रक़म कीं तू नेजल्वा-अफ़रोज़ नज़र प्यारे क़लम कीं तू नेतेरी जुम्बिश का नतीजा हैं ये दफ़्तर लाखोंनक़्श-ए-ख़ुश-रंग के मम्नून हैं पत्थर लाखोंतेरा लिक्खा हुआ मेरा ख़त-ए-तक़्दीर भी हैक्या कहूँ लौह-ए-जबीं पर तिरी तहरीर भी हैदो-जहाँ में है लक़ब ख़ामा-ए-क़ुदरत तेराअल्लह अल्लाह ये है पाया-ए-रिफ़अत तेरातेरी मम्नून मिरी सैंकड़ों तहरीरें हैंतेरी खींची हुई ख़ुश-रंग वो तस्वीरें हैंऐ क़लम रिश्ता-ए-उल्फ़त तिरा टूटे न कभीहाथ से 'बासित'-ए-रंजूर के छूटे न कभी
कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता हैकि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव मेंगुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थीये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर हैतिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थीअजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो करतिरे जमाल की रानाइयों में खो रहतातिरा गुदाज़-बदन तेरी नीम-बाज़ आँखेंइन्ही हसीन फ़सानों में महव हो रहतापुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने कीतिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेताहयात चीख़ती फिरती बरहना सर और मैंघनेरी ज़ुल्फ़ों के साए में छुप के जी लेतामगर ये हो न सका और अब ये आलम हैकि तू नहीं तिरा ग़म तेरी जुस्तुजू भी नहींगुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसेइसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहींज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गलेगुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों सेमुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैंहयात ओ मौत के पुर-हौल ख़ारज़ारों सेन कोई जादा-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरीइन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो करमैं जानता हूँ मिरी हम-नफ़स मगर यूँहीकभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँचली है रस्म कि कोई न सर उठा के चलेजो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकलेनज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चलेहै अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशादकि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
वो राज़ है ये ग़म आह जिसे पा जाए कोई तो ख़ैर नहींआँखों से जब आँसू बहते हैं आ जाए कोई तो ख़ैर नहींज़ालिम है ये दुनिया दिल को यहाँ भा जाए कोई तो ख़ैर नहीं
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरीज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए!हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!हो मिरे दम से यूँही मेरे वतन की ज़ीनतजिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
ये वाक़िएहादसेतसादुमहर एक ग़मऔर हर इक मसर्रतहर इक अज़िय्यतहर एक लज़्ज़तहर इक तबस्सुमहर एक आँसूहर एक नग़्माहर एक ख़ुशबूवो ज़ख़्म का दर्द होकि वो लम्स का हो जादूख़ुद अपनी आवाज़ हो कि माहौल की सदाएँये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँवो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचलतमाम एहसाससारे जज़्बेये जैसे पत्ते हैंबहते पानी की सतह परजैसे तैरते हैंअभी यहाँ हैंअभी वहाँ हैंऔर अब हैं ओझलदिखाई देता नहीं है लेकिनये कुछ तो हैजो कि बह रहा हैये कैसा दरिया हैकिन पहाड़ों से आ रहा हैये किस समुंदर को जा रहा हैये वक़्त क्या है
अब सो जाओऔर अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दोतुम चाँद से माथे वाले होऔर अच्छी क़िस्मत रखते होबच्चे की सौ भोली सूरतअब तक ज़िद करने की आदतकुछ खोई खोई सी बातेंकुछ सीने में चुभती यादेंअब इन्हें भुला दो सो जाओऔर अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दोसो जाओ तुम शहज़ादे होऔर कितने ढेरों प्यारे होअच्छा तो कोई और भी थीअच्छा फिर बात कहाँ निकलीकुछ और भी यादें बचपन कीकुछ अपने घर के आँगन कीसब बतला दो फिर सो जाओऔर अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दोये ठंडी साँस हवाओं कीये झिलमिल करती ख़ामोशीये ढलती रात सितारों कीबीते न कभी तुम सो जाओऔर अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो
तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगीजो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगीभड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगीघनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगीकि आज तक आज़मा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही होनहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगीवफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगीमुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगीजुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगीक़रीब बढ़ती ही आ रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
आज के नामऔरआज के ग़म के नामआज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ाज़र्द पत्तों का बनज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस हैदर्द की अंजुमन जो मिरा देस हैक्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नामकिर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नामपोस्ट-मैनों के नामताँगे वालों का नामरेल-बानों के नामकार-ख़ानों के भूके जियालों के नामबादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़दहक़ाँ के नामजिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गएजिस की बेटी को डाकू उठा ले गएहाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली हैदूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली हैजिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तलेधज्जियाँ हो गई हैउन दुखी माओं के नामरात में जिन के बच्चे बिलकते हैं औरनींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहींदुख बताते नहींमिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं
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