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नज़्म
गर तो है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है
ऐ ग़ाफ़िल तुझ से भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
''हर एक करवट मैं याद करता हूँ तुम को लेकिन
ये करवटें लेते रात दिन यूँ मसल रहे हैं मिरे बदन को