aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "badar"
शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँजगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ऐ दिल पहले भी तन्हा थे, ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैंऔर उन ज़ख़्मों और दाग़ों से अब अपनी बातें होती हैंजो ज़ख़्म कि सुर्ख़ गुलाब हुए, जो दाग़ कि बदर-ए-मुनीर हुएइस तरहा से कब तक जीना है, मैं हार गया इस जीने से
मिरे दिल, मिरे मुसाफ़िरहुआ फिर से हुक्म सादिरकि वतन-बदर हों हम तुमदें गली गली सदाएँकरें रुख़ नगर नगर, काकि सुराग़ कोई पाएँकिसी यार-ए-नामा-बर काहर इक अजनबी से पूछेंजो पता था अपने घर कासर-ए-कू-ए-ना-शनायाँहमें दिन से रात करनाकभी इस से बात करनाकभी उस से बात करनातुम्हें क्या कहूँ कि क्या हैशब-ए-ग़म बुरी बला हैहमें ये भी था ग़नीमतजो कोई शुमार होताहमें क्या बुरा था मरनाअगर एक बार होता!
बहुत सताती हो जानम बहुत सताती होमैं भूल जाऊँ मगर कैसे भूल जाऊँ भलाअज़ाब-ए-जाँ की हक़ीक़त का अपनी अफ़्सानामिरे सफ़र के वो लम्हे तुम्हारी पुर-हालीवो बात बात मुझे बार बार समझाना
इक उम्र के बाद तुम मिले होऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओहर हिज्र का दिन था हश्र का दिनदोज़ख़ थे फ़िराक़ के अलावरोऊँ कि हँसूँ समझ न आएहाथों में हैं फूल दिल में घावतुम आए तो साथ ही तुम्हारेबिछड़े हुए यार याद आएइक ज़ख़्म पे तुम ने हाथ रक्खाऔर मुझ को हज़ार याद आएवो सारे रफ़ीक़ पा-ब-जौलाँसब कुश्ता-ए-दार याद आएहम सब का है एक ही क़बीलाइक दश्त के सारे हम-सफ़र हैंकुछ वो हैं जो दूसरों की ख़ातिरआशुफ़्ता-नसीब ओ दर-ब-दर हैंकुछ वो हैं जो ख़िलअत-ओ-क़बा सेऐवान-ए-शही में मो'तबर हैंसुक़रात ओ मसीह के फ़सानेतुम भी तो बहुत सुना रहे थेमंसूर ओ हुसैन से अक़ीदततुम भी तो बहुत जता रहे थेकहते थे सदाक़तें अमर हैंऔरों को यही बता रहे थेऔर अब जो हैं जा-ब-जा सलीबेंतुम बाँसुरियाँ बजा रहे होऔर अब जो है कर्बला का नक़्शातुम मदह-ए-यज़ीद गा रहे होजब सच तह-ए-तेग़ हो रहा हैतुम सच से नज़र चुरा रहे होजी चाहता है कि तुम से पूछूँक्या राज़ इस इज्तिनाब में हैतुम इतने कठोर तो नहीं थेये बे-हिसी किसी हिसाब में हैतुम चुप हो तो किस तरह से चुप होजब ख़ल्क़-ए-ख़ुदा अज़ाब में हैसोचो तो तुम्हें मिला भी क्या हैइक लुक़्मा-ए-तर क़लम की क़ीमतग़ैरत को फ़रोख़्त करने वालोइक कासा-ए-ज़र क़लम की क़ीमतपिंदार के ताजिरो बताओदरबान का दर क़लम की क़ीमतनादाँ तो नहीं हो तुम कि समझूँग़फ़लत से ये ज़हर घोलते होथामे हुए मस्लहत की मीज़ानहर शेर का वज़्न तौलते होऐसे में सुकूत, चश्म-पोशीऐसा है कि झूट बोलते होइक उम्र से अदल ओ सिद्क़ की लाशग़ासिब की सलीब पर जड़ी हैइस वक़्त भी तुम ग़ज़ल-सरा होजब ज़ुल्म की हर घड़ी कड़ी हैजंगल पे लपक रहे हैं शोलेताऊस को रक़्स की पड़ी हैहै सब को अज़ीज़ कू-ए-जानाँइस राह में सब जिए मरे हैंहाँ मेरी बयाज़-ए-शेर में भीबर्बादी-ए-दिल के मरसिए हैंमैं ने भी किया है टूट कर इश्क़और एक नहीं कई किए हैंलेकिन ग़म-ए-आशिक़ी नहीं हैऐसा जो सुबुक-सरी सिखाएये ग़म तो वो ख़ुश-मआल ग़म हैजो कोह से जू-ए-शीर लाएतेशे का हुनर क़लम को बख़्शेजो क़ैस को कोहकन बनाएऐ हीला-गरान-ए-शहर-ए-शीरींआया हूँ पहाड़ काट कर मैंहै बे-वतनी गवाह मेरीहर-चंद फिरा हूँ दर-ब-दर मैंबेचा न ग़ुरूर-ए-नय-नवाज़ीऐसा भी न था सुबुक हुनर मेंतुम भी कभी हम-नवा थे मेरेफिर आज तुम्हें ये क्या हुआ हैमिट्टी के वक़ार को न बेचोये अहद-ए-सितम जिहाद का हैदरयूज़ा-गरी के मक़बरों सेज़िंदाँ की फ़सील ख़ुशनुमा हैकब एक ही रुत रही हमेशाये ज़ुल्म की फ़स्ल भी कटेगीजब हर्फ़ कहेगा क़ुम-बे-इज़्नीमरती हुई ख़ाक जी उठेगीलैला-ए-वतन के पैरहन मेंबारूद की बू नहीं रहेगीफिर बाँधेंगे अबरुओं के दोहेफिर मद्ह-ए-रुख़-ओ-दहन कहेंगेठहराएँगे उन लबों को मतलाजानाँ के लिए सुख़न कहेंगेअफ़्साना-ए-यार ओ क़िस्सा-ए-दिलफिर अंजुमन अंजुमन कहेंगे
दानिश-वर कहलाने वालोतुम क्या समझोमुबहम चीज़ें क्या होती हैंथल के रेगिस्तान में रहने वाले लोगोतुम क्या जानोसावन क्या हैअपने बदन कोरात में अंधी तारीकी सेदिन में ख़ुद अपने हाथों सेढाँपने वालोउर्यां लोगोतुम क्या जानोचोली क्या है दामन क्या हैशहर-बदर हो जाने वालोफ़ुटपाथों पर सोने वालोतुम क्या समझोछत क्या है दीवारें क्या हैंआँगन क्या हैइक लड़की का ख़िज़ाँ-रसीदा बाज़ू थामेनब्ज़ के ऊपर हाथ जमाएएक सदा पर कान लगाएधड़कन साँसें गिनने वालोतुम क्या जानोमुबहम चीज़ें क्या होती हैंधड़कन क्या है जीवन क्या हैसत्तरह-नंबर के बिस्तर परअपनी क़ैद का लम्हा लम्हा गिनने वालीये लड़की जोबरसों की बीमार नज़र आती है तुम कोसोला साल की इक बेवा हैहँसते हँसते रो पड़ती हैअंदर तक से भीग चुकी हैजान चुकी हैसावन क्या हैइस से पूछोकाँच का बर्तन क्या होता हैइस से पूछोमुबहम चीज़ें क्या होती हैंसूना आँगन तन्हा जीवन क्या होता है
ये लौंडियाँ हैंकि यर्ग़माली हलाल शब-भर रहे हैंदम-ए-सुब्ह दर-ब-दर हैंहुज़ूर के नुतफ़े को मुबारक के निस्फ़ विर्सा से बे-मो'तबर हैंये बीबियाँ हैंकि ज़ौजगी का ख़िराज देनेक़तार-अंदर-क़तार बारी की मुंतज़िर हैंये बच्चियाँ हैंकि जिन के सर पर फिरा जो हज़रत का दस्त-ए-शफ़क़ततो कम-सिनी के लहू से रीश-ए-सपेद रंगीन हो गई हैहुज़ूर के हजला-ए-मोअत्तर में ज़िंदगी ख़ून रो गई हैपड़ा हुआ है जहाँ ये लाशातवील सदियों से क़त्ल-ए-इंसानियत का ये ख़ूँ-चकाँ तमाशाअब इस तमाशा को ख़त्म कीजेहुज़ूर अब इस को ढाँप दीजिए
मैं ने चाहा था उसे रूह की राहत के लिएआज वो जान का आज़ार बनी बैठी हैमेरी आँखों ने जिसे फूल से नाज़ुक समझाअब वो चलती हुई तलवार बनी बैठी हैहम-सफ़र बन के जिसे नाज़ था हमराही पररहज़नों की वो तरफ़-दार बनी बैठी हैकिसी अफ़्साने का किरदार बनी बैठी हैउस की मासूमियत-ए-दिल पे भरोसा था मुझेअज़्म-ए-सीता की क़सम इस्मत-ए-मर्यम की क़समयाद हैं उस के वो हँसते हुए आँसू मुझ कोख़ंदा-ए-गुल की क़सम गिर्या-ए-शबनम की क़समउस ने जो कुछ भी कहा मैं ने वही मान लियाहुक्म-ए-हव्वा की क़सम जज़्बा-ए-आदम की क़समपाक थी रूह मिरी चश्मा-ए-ज़मज़म की क़सममैं ने चाहा था उसे दिल में छुपा लूँ ऐसेजिस्म में जैसे लहू सीप में जैसे मोतीउम्र भर मैं न झपकता कभी अपनी आँखेंमेरे ज़ानूँ पे वो सर रख के हमेशा सोतीशम्-ए-यक-शब तो समझता है उसे एक जहाँकाश हो जाती वो मेरे लिए जीवन-जोतीदर-ब-दर उस की तमाज़त न परेशाँ होतीमैं उसे ले के बहुत दूर निकल जाऊँ मगरवो मिरी राह में दीवार बनी बैठी हैज़िंदगी भर की परस्तिश उसे मंज़ूर नहींवो तो लम्हों की परस्तार बनी बैठी हैमैं ने चाहा था उसे रूह की राहत के लिएवो मगर जान का आज़ार बनी बैठी हैकिसी अफ़्साने का किरदार बनी बैठी है
बच्चे माओं की गोदों में सहमे हुए हैंइस्मतें सर-बरहना परेशान हैंहर तरफ़ शोर-ए-आह-ओ-बुका हैऔर मैं इस तबाही के तूफ़ान मेंआग और ख़ूँ के हैजान मेंसर-निगूँ और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों परअपने नग़्मों की झोली पसारेदर-ब-दर फिर रहा हूँमुझ को अम्न और तहज़ीब की भीक दोमेरे गीतों की लय मेरा सुर मेरी नयमेरे मजरूह होंटों को फिर सौंप दोसाथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिएइंक़लाब और बग़ावत के नग़्मे अलापेअजनबी राज के ज़ुल्म की छाँव मेंसरफ़रोशी के ख़्वाबीदा जज़्बे उभारेऔर उस सुब्ह की राह देखीजिस में इस मुल्क की रूह आज़ाद होआज ज़ंजीर-ए-महकूमियत कट चुकी हैऔर इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दरअजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैंखेत सोना उगलने को बेचैन हैंवादियाँ लहलहाने को बेताब हैंकोहसारों के सीने में हैजान हैसंग और ख़िश्त बे-ख़्वाब व बेदार हैंउन की आँखों में तामीर के ख़्वाब हैंउन के ख़्वाबों को तकमील का रूप दोमुल्क की वादियाँ घाटियाँ खेतियाँऔरतें बच्चियांहाथ फैलाए ख़ैरात की मुंतज़िर हैंइन को अम्न और तहज़ीब की भीक दोमाओं को उन के होंटों की शादाबियाँनन्हे बच्चों को उन की ख़ुशी बख़्श दोमुल्क की रूह को ज़िंदगी बख़्श दोमुझ को मेरा हुनर मेरी लय बख़्श दोआज सारी फ़ज़ा है भिकारीऔर मैं इस भिकारी फ़ज़ा मेंअपने नग़्मों की झोली पसारेदर-ब-दर फिर रहा हूँमुझ को फिर मेरा खोया हुआ साज़ दोमैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिएजब भी आया नए गीत लाता रहूँगा
चार तिनके उठा के जंगल सेएक बाली अनाज की ले करचंद क़तरे बिलकते अश्कों केचंद फ़ाक़े बुझे हुए लब परमुट्ठी भर अपनी क़ब्र की मिट्टीमुट्ठी भर आरज़ूओं का गाराएक तामीर की, लिए हसरततेरा ख़ाना-ब-दोश बे-चाराशहर में दर-ब-दर भटकता है
कभी कभी दिल ये सोचता हैन जाने हम बे-यक़ीन लोगों को नाम-ए-हैदर से रब्त क्यूँ हैहकीम जाने वो कैसी हिकमत से आश्ना थाशजीअ जाने कि बदर ओ ख़ैबर की फ़त्ह-मंदी का राज़ क्या थाअलीम जाने वो इल्म के कौन से सफ़ीनों का ना-ख़ुदा थामुझे तो बस सिर्फ़ ये ख़बर हैवो मेरे मौला की ख़ुशबुओं में रचा-बसा थावो उन के दामान-ए-आतिफ़त में पला बढ़ा थाऔर उस के दिन रात मेरे आक़ा के चश्म ओ अबरू ओ जुम्बिश-ए-लब के मुंतज़िर थेवो रात को दुश्मनों के नर्ग़े में सो रहा था तो उन की ख़ातिरजिदाल में सर से पाँव तक सुर्ख़ हो रहा था तो उन की ख़ातिरसो उस को महबूब जानता हूँसो उस को मक़्सूद मानता हूँसआदतें उस के नाम से हैंमोहब्बतें उस के नाम से हैंमोहब्बतों के सभी घरानों की निस्बतें उस के नाम से हैं
आलिम बड़े बड़े हैं तो लीडर गली गलीबारिश है अफ़सरों की तो दफ़्तर गली गलीशाइ'र अदीब और सुख़नवर गली गलीसुक़रात दर-ब-दर हैं सिकंदर गली गलीसब कुछ है अपने देस में रोटी नहीं तो क्यावा'दा लपेट लो जो लंगोटी नहीं तो क्या
जब दिन ढल जाता है, सूरज धरती की ओट में हो जाता हैऔर भिड़ों के छत्ते जैसी भिन-भिनबाज़ारों की गर्मी, अफ़रा-तफ़रीमोटर, बस, बर्क़ी रेलों का हंगामा थम जाता हैचाय-ख़ानों नाच-घरों से कम-सिन लड़केअपने हम-सिन माशूक़ों कोजिन की जिंसी ख़्वाहिश वक़्त से पहले जाग उठी हैले कर जा चुकते हैंबढ़ती फैलती ऊँची हिमाला जैसी तामीरों पर ख़ामोशी छा जाती हैथेटर तफ़रीह-गाहों में ताले पड़ जाते हैंऔर ब-ज़ाहिर दुनिया सो जाती हैमैं अपने कमरे में बैठा सोचा करता हूँकुत्तों की दुम टेढ़ी क्यूँ होती हैये चितकबरी दुनिया जिस का कोई भी किरदार नहीं हैकोई फ़ल्सफ़ा कोई पाइंदा अक़दार नहीं, मेआर नहीं हैइस पर अहल-ए-दानिश विद्वान, फ़लसफ़ीमोटी मोटी अदक़ किताबें क्यूँ लिक्खा करते हैं?'फ़ुर्क़त' की माँ ने शौहर के मरने पर कितना कोहराम मचाया थालेकिन इद्दत के दिन पूरे होने से इक हफ़्ता पहले'नीलम' के मामूँ के साथ बदायूँ जा पहुँची थीबी-बी की सेहनक, कोंडे, फ़ातिहा-ख़्वानीजंग-ए-सिफ्फ़ीन, जमल और बदर के क़िस्सोंसीरत-ए-नबवी, तर्क-ए-दुनिया और मौलवी-साहब के हलवे मांडे में क्या रिश्ता है?
मैं तो हर रात यही सोच के सोता हूँ कि कलसुब्ह शायद तिरे दीदार का सूरज निकलेऔर हर रोज़ तिरे ख़्वाब लिए आँखों मेंदर-ब-दर घूमता फिरता हूँ कि दिन कट जाएऔर फिर रात को जब लौट के आऊँ घर कोमुंतज़िर हो तिरा पैकर मिरे दरवाज़े परया तो फिर कल की तरह रात गुज़र जाए मिरीऔर जब सुब्ह को जागूँ तो तुझी को देखूँ
वारिस हैं जिन के जीते वो मुर्दे भी आन करहलवे चपाती ख़ूब ही चखते हैं पेट-भरजिन का कोई नहीं है वो फिरते हैं दर-ब-दरऔरों के लगते फिरते हैं कोनों से घर-ब-घरउन की है खारी नून से भी खारी शब-बरात
मुकद्दर है फ़ज़ा-ए-आलम-ए-इम्काँ सियासत सेबहुत बे-आबरू है आज-कल इंसाँ सियासत सेज़मीर-ओ-ज़र्फ़ की उस के यहाँ क़ीमत नहीं कोईजहाँ में दर-ब-दर हैं साहब-ए-ईमाँ सियासत सेये एहसासात-ए-तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को मिटाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैनहीं शेवा सियासत का मोहब्बत और रवादारीसिखाती है परस्तारों को अपने ये रिया-कारीन इस का कोई मस्लक है न इस का कोई मज़हब हैदिल-ए-हर्स-ओ-हवस में बन के रहती है ये चिंगारीकिसी का घर गिराती है किसी का घर सजाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैलड़ाती है यही इक दूसरे को ज़ात-ओ-मज़हब परइसी की शह पे क़त्ल-ए-आम होता है यहाँ अक्सररऊनत ये सिखाती है मुनाफ़िक़ हुक्मरानों कोइसी के बत्न से होते हैं पैदा जब्र-ओ-ज़ुलम-ओ-शरये अपने मुहसिनों का ख़ून पी कर मुस्कुराती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैसदा ये इत्तिहाद-ए-बाहमी पर वार करती हैतअ'स्सुब को हवा देती है दिल बेज़ार करती हैकहीं ता'मीर करती है इबादत-गाह फ़ित्नों सेकहीं ख़ुद ही इबादत-गाह को मिस्मार करती हैफ़रेब-ओ-मक्र से अपने ये हर-सू क़हर ढाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैइसी के दम से फ़स्लें लहलहाती हैं फ़सादों कीयही तकमील करती है हुकूमत के इरादों कीइसी की मस्लहत से बुग़्ज़ के पौदे पनपते हैंगिरा देती है ये दीवार बाहम एतिमादों कीहवा दे कर ये बद-उनवानियों की लौ बढ़ाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैइशारे पर इसी के शहर क़स्बे गाँव जलते हैंइसी की आस्तीं में साज़िशों के नाग पलते हैंसितमगारों पे करती है ये साया अपने आँचल काइसी की आड़ में अशरार-ओ-क़ातिल बच निकलते हैंये क़ानून-ओ-अदालत को भी अब आँखें दिखाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैजसारत को यही दहशत-गरी का नाम देती हैये हम-साए को ख़ुद ही जंग का पैग़ाम देती हैबदलती है यही तक़दीर अर्बाब-ए-क़यादत कीये अपने वारिसों को सरख़ुशी का जाम देती हैये वा'दों के घरौंदे रेगज़ारों में बनाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती है
मैं भी था बे-अमाँतुम भी थे दर-ब-दरलोग थे बे-ख़बरइश्क़ हैरान था
क़ातिल जो मेरा ओढ़े इक सुर्ख़ शाल आयाखा खा के पान ज़ालिम कर होंठ लाल आयागोया निकल शफ़क़ से बदर-ए-कमाल आयाजब मुँह से वो परी-रू मल कर गुलाल आयाइक दम तो देख उस को होली को हाल आया
आज उन्हों ने ऐलान कर ही दियादेखो!हम ने तुम्हारी सब की सब क़ुव्वतों का फ़ैसला किया थाक़ील-ओ-क़ाल की गुंजाइश बाक़ी नहीं हैतुम्हारे इक़रार-नामे हमारे पास महफ़ूज़ हैंतुम से पहले वालों की ख़ता यही थीकि उन्हें,अपनी नाफ़ के नीचे सरसराहट का एहसासकुछ ज़ियादा ही हो चला थाउन्हें शहर-बदर कर दिया गयाउन के पछतावे और गिड़गिड़ाहटेंआज भी हमारे कानों में महफ़ूज़ हैंतुम्हें इतनी छूट दी ही क्यूँ जाएकि तुमकल हमारे मुक़ाबले पर उतर आओहम तुम्हें होशियार किए देते हैंदीवारें फलांगने वालेइताब से बच नहीं सकतेअक़्द-नामों पर तुम्हारे दस्तख़ततुम्हारी ना-मुरादी का खुला ए'तिराफ़ हैंइस के बग़ैरहमारी हरम-सरा मेंदाख़िल होने के इजाज़त-नामेतुम्हें मिल भी कैसे सकते थेइस से पहले कि हमारे नजीबुत-तरफ़ैन शजरे मश्कूक हो जाएँऔर हमारे हसब-नसब पर आँच आ जाएहम!तुम से पहले गुलू-ख़लासी का रास्ता ढूँड निकालेंगे!!
ख़्वाब अब हुस्न-ए-तसव्वुर के उफ़ुक़ से हैं परेदिल के इक जज़्बा-ए-मासूम ने देखे थे जो ख़्वाबऔर ताबीरों के तपते हुए सहराओं मेंतिश्नगी आबला-पा शोला-ब-कफ़ मौज-ए-सराबये तो मुमकिन नहीं बचपन का कोई दिन मिल जाएया पलट आए कोई साअत-ए-नायाब-ए-शबाबफूट निकले किसी अफ़्सुर्दा तबस्सुम से किरनया दमक उट्ठे किसी दस्त-ए-बुरीदा में गुलाबआह पत्थर की लकीरें हैं कि यादों के नुक़ूशकौन लिख सकता है फिर उम्र-ए-गुज़िश्ता की किताबबीते लम्हात के सोए हुए तूफ़ानों मेंतैरते फिरते हैं फूटी हुई आँखों के हुबाबताबिश-ए-रंग-ए-शफ़क़ आतिश-ए-रू-ए-ख़ुर्शीदमिल के चेहरे पे सहर आई है ख़ून-ए-अहबाबजाने किस मोड़ पे किस राह में क्या बीती हैकिस से मुमकिन है तमन्नाओं के ज़ख़्मों का हिसाबआस्तीनों को पुकारेंगे कहाँ तक आँसूअब तो दामन को पकड़ते हैं लहू के गिर्दाबदेखती फिरती है एक एक मुँह ख़ामोशीजाने क्या बात है शर्मिंदा है अंदाज़-ए-ख़िताबदर-ब-दर ठोकरें खाते हुए फिरते हैं सवालऔर मुजरिम की तरह उन से गुरेज़ाँ है जवाबसरकशी फिर मैं तुझे आज सदा देता हूँमैं तिरा शाइर-ए-आवरा ओ बे-बाक-ओ-ख़राबफेंक फिर जज़्बा-ए-बे-ताब की आलम पे कमंदएक ख़्वाब और भी ऐ हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
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