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नज़्म
कभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम ओ दिल-रफ़्ता
कभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कभी सिकंदर कभी क़लंदर कभी बगूला कभी ख़याल
स्वाँग रचाए और गुज़र की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
इक जुनूँ-पर्वर बगूला है वो इल्म-ए-बे-वसूक़
जिस की रौ में काँपने लगते हैं शौहर के हुक़ूक़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फफूला ख़याल की रेत का बगूला वो इश्क़-ए-बर्बाद
का हेयूला हुजूम में से पुकार उट्ठी अबू-लहब
नून मीम राशिद
नज़्म
देख वो मैदान में है इक बगूला बे-क़रार
आँधियों की गोद में हो जैसे मुफ़लिस का मज़ार
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मेंढ़ जिधर ले जाती थी उस सम्त रवाँ हो जाती थी
गीत के लय बढ़ते ही तुंद बगूला बन जाती थी
ख़ातिर ग़ज़नवी
नज़्म
बगूला सा मिरे दिल में कहीं से उठता है
बहुत सुकूँ है मगर मुझ को एक बात से के
डॉ भावना श्रीवास्तव
नज़्म
इस तरह तड़पने लगता है रह रह के दिल 'नाशाद' अक्सर
जैसे कि बगूला उठता है जैसे कोई तूफ़ाँ आता है