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नज़्म
फ़क़त वो बैलों की चक्कियाँ थीं सरों से ख़ाली
फ़रेब खाते थे ख़ून पीते थे और नींदें थीं बज्जुओं की
अली अकबर नातिक़
नज़्म
गुनगुनाती बैलों पर फूल कसमसाते थे
जुगनुओं की झिलमिल से राज-हँस सोते से जाग जाग उठते थे
अज़रा नक़वी
नज़्म
शाम हुई मंदिर में देखो घंटे लोग बजाते हैं
रात हुई बैलों को ले कर हरवाहे अब जाते हैं
जौहर निज़ामी
नज़्म
संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे
बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
उँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
कफ़ील आज़र अमरोहवी
नज़्म
उन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई बरनाई भी
माओं के जवाँ बेटे भी गए बहनों के चहेते भाई भी