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नज़्म
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
नज़र आता है यूँ लगता है जैसे ये बला-ए-जाँ
मिरा हम-ज़ाद है हर गाम पर हर मोड़ पर जौलाँ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कैसे कैसे अक़्ल को दे कर दिलासे जान-ए-जाँ
रूह को तस्कीन दी है दिल को समझाया भी है
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो
कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
बिर्ज लाल रअना
नज़्म
या'नी हम भी दस्त-ए-क़ुदरत में मिसाल-ए-जाम हैं
और गिरफ़्तार-ए-बला-ए-गर्दिश-ए-अय्याम हैं
अमजद नजमी
नज़्म
यहीं खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी
बला-ए-फ़िक्र-ए-फ़र्दा हम से कोसों दूर होती थी