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नज़्म
हदें वो खींच रक्खी हैं हरम के पासबानों ने
कि बिन मुजरिम बने पैग़ाम भी पहुँचा नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तमाम कूज़े बनते बनते 'तू' ही बन के रह गए
नशात इस विसाल-ए-रह-गुज़र की ना-गहाँ मुझे निगल गई
नून मीम राशिद
नज़्म
तारिक़ क़मर
नज़्म
जिस कल की ख़ातिर जीते-जी मरते रहे वो कल आ न सका
लेकिन ये लड़ाई ख़त्म नहीं ये जंग न होगी बंद कभी