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नज़्म
अगर है चूकना मंज़ूर क़ुराँ की तिलावत से
बरा-ए-ज़ख़्म-ए-ग़फ़लत मरहम-ए-ज़ंगार पैदा कर
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
सो मैं कमीं-गाह-ए-आफ़ियत में चला गया था
सो मैं अमाँ-गाह-ए-मस्लहत में चला गया था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
सड़क जो आती है छावनी से चहल-पहल उस पे ख़ूब ही है
निकल के गुंजान बस्तियों से बरा-ए-तफ़रीह सब हैं आए
नुशूर वाहिदी
नज़्म
झूट क्यूँ बोलें फ़रोग़-ए-मस्लहत के नाम पर
ज़िंदगी प्यारी सही लेकिन हमें मरना तो है