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नज़्म
ये हसरत थी कि मौजों के तलातुम में बहा जाता
मैं अपनी कश्ती-ए-बे-बादबाँ का पासबाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
मिट के बर्बाद-ए-जहाँ हो के सभी कुछ खो के
बात क्या है कि ज़ियाँ का कोई एहसास नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कच्ची दीवार से गिरती हुई मिट्टी की तरह
काँप काँप उठता है बर्बाद-ए-मोहब्बत का वजूद
प्रेम वारबर्टनी
नज़्म
वहाँ परियाँ मोहब्बत के ख़ुदा के गीत गाती हैं
कनार-ए-आब-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ बाहम सैर करते हैं
नज़ीर मिर्ज़ा बर्लास
नज़्म
देखिए देते हैं किस किस को सदा मेरे बाद
'कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़'
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
उस से पोशीदा नहीं हैं राज़हा-ए-हुस्न-ओ-इश्क़
तर्जुमाँ है अहल-ए-उल्फ़त का वो सिर्र-ए-दिल-बराँ
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
फ़िरदौस-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ है दामान-ए-लखनऊ
आँखों में बस रहे हैं ग़ज़ालान-ए-लखनऊ