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नज़्म
थकन दिन की समेटे शब को घर जाने पे कौन उस के
लिए दहलीज़ पर बैठा... दुआ की मिशअलें दिल में
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
सीमा ग़ज़ल
नज़्म
दूर पहाड़ों के उस जानिब जलता सूरज रात के ख़ेमों में चुप बैठा
आने वाले कल की बाबत सोच रहा है
सलीम कौसर
नज़्म
हमारे वतन में भी होगा
मैं दरबारियों में तो क्या नौकरों के जिलौ में बहुत दूर बैठा
जमीलुद्दीन आली
नज़्म
ख़म-ब-ख़म ज़ुल्फ़ों का वो चेहरे पे मेरे लोटना
भीनी भीनी निकहतों में डूब जाना याद है
हबीब जौनपुरी
नज़्म
दुश्नाम और बलवों के और दू-ब-दू के बीच
जैसे कि कोई बैठा हो बज़्म-ए-अदू के बीच
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
बैठा क़ब्रें खोद रहा हूँ, हूक सी बन कर एक इक मूरत
दर्द सा बन कर एक इक साया, जाग रहे हैं दूर कहीं से
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मैं दूर कहीं तुम से बैठा इक दीप की जानिब तकता हूँ
इक बज़्म सजाए रक्खी है इक दर्द जगाए रखता हूँ
वसीम बरेलवी
नज़्म
उठे हैं बहर-ए-दुआ कितने काँपते हुए हाथ
किस एहतिमाम से बाँधा गया है रख़्त-ए-सफ़र